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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 25: वाराणसी के सारे निवासियों का वैष्णव बनना  »  श्लोक 167
 
 
श्लोक  2.25.167 
निज - लोक लञा प्रभु आइला वासाघर ।
वाराणसी हैल द्वितीय नदीया - नगर ॥167॥
 
 
अनुवाद
श्री चैतन्य महाप्रभु अपने निजी पार्षदों के साथ अपने निवास स्थान पर लौट आए। इस प्रकार उन्होंने पूरे वाराणसी नगर को एक और नवद्वीप [नदिया नगर] में बदल दिया।
 
Sri Chaitanya Mahaprabhu then returned to his residence with his associates. Thus, he transformed the entire city of Varanasi into another Navadvipa (Nadiya city).
तात्पर्य
नवद्वीप और वारणसी दोनों ही अपनी उच्च शैक्षणिक गतिविधियों के लिए प्रसिद्ध थे। वर्तमान समय में भी इन शहरों में महान, विद्वान विद्वान निवास करते हैं, लेकिन वाराणसी विशेष रूप से मायावादी सन्यासियों का केंद्र है जो विद्वान विद्वान हैं। हालाँकि, नवद्वीप के विपरीत, वाराणसी में शायद ही कोई भक्त हैं। परिणामस्वरूप, वाराणसी में श्रीमद-भागवतम की चर्चा बहुत दुर्लभ थी। नवद्वीप में, ऐसी चर्चा काफी सामान्य थी। श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा वाराणसी का दौरा करने और प्रकाशानंद सरस्वती और उनके शिष्यों को वैष्णवों में बदलने के बाद, वाराणसी नवद्वीप जैसा बन गया क्योंकि इतने सारे भक्तों ने श्रीमद-भागवतम पर चर्चा करना शुरू कर दिया। वर्तमान समय में भी कोई भी गंगा के तट पर हो रही श्रीमद-भागवतम पर कई चर्चाओं को सुन सकता है। कई विद्वान और सन्यासी वहाँ श्रीमद-भागवतम सुनने और संकीर्तन करने के लिए एकत्र होते हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)