श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 25: वाराणसी के सारे निवासियों का वैष्णव बनना  »  श्लोक 137
 
 
श्लोक  2.25.137 
न साधयति मां योगो न साङ्ख्यं धर्म उद्धव ।
न स्वाध्यायस्तपस्त्यागो यथा भक्तिर्ममोजिता ॥137॥
 
 
अनुवाद
“[परम पुरुषोत्तम भगवान कृष्ण ने कहा:] ‘मेरे प्रिय उद्धव, न तो अष्टांग योग [इंद्रियों को वश में करने की रहस्यमय योग प्रणाली] के द्वारा, न ही निराकार अद्वैतवाद या परम सत्य के विश्लेषणात्मक अध्ययन के द्वारा, न ही वेदों के अध्ययन के द्वारा, न ही तपस्या, दान या संन्यास ग्रहण करने के द्वारा कोई मुझे उतना संतुष्ट कर सकता है जितना कि मेरी अनन्य भक्ति विकसित करने से।’
 
“[The Supreme Personality of Godhead, Krishna, said:] ‘O Uddhava, no one can please Me by eightfold yoga, nor by impersonalism, nor by analytical study of the Absolute Truth, nor by study of the Vedas, nor by austerities, nor by charity, nor by renunciation, as much as by developing exclusive devotion to Me.’
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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