श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 25: वाराणसी के सारे निवासियों का वैष्णव बनना  »  श्लोक 135
 
 
श्लोक  2.25.135 
एइत’ ‘सम्बन्ध’, शुन ‘अभिधेय’ भक्ति ।
भागवते प्रति - श्लोके व्यापे झार स्थिति ॥135॥
 
 
अनुवाद
"यह भगवान के साथ हमारा शाश्वत संबंध है। अब कृपया भक्ति के आचरण के बारे में सुनें। यह सिद्धांत श्रीमद्भागवत के प्रत्येक श्लोक में व्याप्त है।"
 
This is man's eternal relationship with the Supreme Personality of Godhead. Now listen to the topic of devotional service. This principle pervades every verse of the Srimad Bhagavatam.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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