श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 25: वाराणसी के सारे निवासियों का वैष्णव बनना  »  श्लोक 129
 
 
श्लोक  2.25.129 
सर्वभूतेषु यः पश्येद्भगवद्भावमात्मनः ।
भूतानि भगवत्यात्मन्येष भागवतोत्तमः ॥129॥
 
 
अनुवाद
“भक्ति में प्रगाढ़ व्यक्ति प्रत्येक वस्तु के भीतर आत्माओं की आत्मा, भगवान् श्रीकृष्ण को देखता है। फलस्वरूप वह सदैव भगवान् के रूप को सभी कारणों का कारण मानता है और समझता है कि सभी वस्तुएँ उन्हीं में स्थित हैं।
 
"A person advanced in devotion (Bhagavata) sees the Supreme Personality of Godhead, Krishna, the Soul of souls, within everything. Consequently, he sees the form of the Supreme Personality of Godhead as the cause of all causes and understands that all things are situated in Him."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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