श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 25: वाराणसी के सारे निवासियों का वैष्णव बनना  »  श्लोक 124
 
 
श्लोक  2.25.124 
आमाते ये ‘प्रीति’, सेइ ‘प्रेम’ - ‘प्रयोजन’ ।
कार्य - द्वारे कहि तार ‘स्वरूप’ - लक्षण ॥124॥
 
 
अनुवाद
"मेरे प्रति परम स्नेह को भगवत्प्रेम कहते हैं, और यही जीवन का परम लक्ष्य है। मैं एक व्यावहारिक उदाहरण द्वारा ऐसे प्रेम के स्वाभाविक लक्षणों को समझाता हूँ।"
 
"For me, supreme affection (priti) is called love for God, and this is the ultimate goal (prayoga) of life. I will explain the natural characteristics of such love by a practical example."
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas