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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 25: वाराणसी के सारे निवासियों का वैष्णव बनना  »  श्लोक 121
 
 
श्लोक  2.25.121 
‘धर्मादि’ विषये यैछे ए ‘चारि’ विचार ।
साधन - भक्ति - एइ चारि विचारेर पार ॥121॥
 
 
अनुवाद
"जहाँ तक धार्मिक सिद्धांतों का प्रश्न है, व्यक्ति, देश, काल और परिस्थिति का विचार किया जाता है। किन्तु, भक्ति में ऐसे कोई विचार नहीं होते। भक्ति इन सभी विचारों से परे है।"
 
"Religious principles consider person, place, time, and condition. But devotion does not. Devotion transcends all these considerations.
तात्पर्य
जब हम भौतिक प्लेटफ़ॉर्म पर होते हैं, तो वहाँ विभिन्न प्रकार के धर्म होते हैं - हिंदू धर्म, ईसाई धर्म, इस्लाम, बौद्ध धर्म आदि। ये किसी विशेष समय, विशेष देश या विशेष व्यक्ति के लिए होते हैं। परिणामस्वरूप अंतर होते हैं। ईसाई सिद्धांत हिंदू सिद्धांतों से अलग होते हैं, और हिंदू सिद्धांत मुस्लिम और बौद्ध सिद्धांतों से अलग होते हैं। इन पर भौतिक प्लेटफ़ॉर्म पर विचार किया जा सकता है, लेकिन जब हम भगवद् भक्ति सेवा के प्लेटफ़ॉर्म पर आते हैं, तो इस तरह के कोई विचार नहीं होते हैं। भगवान की अनुत्तरित सेवा (साधन-भक्ति) इन सिद्धांतों से ऊपर है। दुनिया धार्मिक एकता की इच्छुक है, और उस आम प्लेटफ़ॉर्म को भगवद् भक्ति सेवा में प्राप्त किया जा सकता है। यह श्री चैतन्य महाप्रभु का सिद्धांत है। जब कोई वैष्णव बन जाता है, तो वह इन सभी सीमित विचारों से परे हो जाता है। भगवद गीता (14.26) में भगवान कृष्ण द्वारा इसकी पुष्टि की गई है:

माम् च यो 'व्यभिचारेण भक्ति-योगेन सेवते

स गुणान समतीत्यैतान ब्रह्म-भूयाय कल्पते

"जो सभी परिस्थितियों में पूरी भक्ति सेवा में संलग्न रहता है, वह तुरंत भौतिक प्रकृति के गुणों को पार कर जाता है और ब्रह्म के स्तर पर आ जाता है।"

कृष्ण चेतना आंदोलन की भक्ति गतिविधियाँ भौतिक विचारों के लिए पूरी तरह से अनुत्तरित हैं। जहाँ तक अलग-अलग धर्मों का सवाल है, धर्म अलग-अलग तरह के हो सकते हैं, लेकिन आध्यात्मिक स्तर पर, हर किसी को भक्ति सेवा करने का समान अधिकार है। यही एकता का प्लेटफ़ॉर्म है और एक वर्गहीन समाज का आधार है। अपने अमृत-प्रवाह-भाष्य में, श्रील भक्तिविनोद ठाकुर इस बात की पुष्टि करते हैं कि हमें धार्मिक सिद्धांतों, आर्थिक विकास, इंद्रिय तृप्ति और अंततः मुक्ति के बारे में एक वास्तविक आध्यात्मिक गुरु से सीखना होता है। ये विनियमित जीवन के चार विभाजन हैं, लेकिन वे भौतिक स्तर पर हैं। आध्यात्मिक स्तर पर, चार सिद्धांत ज्ञान, विज्ञान, तदंग और तद्रहस्य हैं। नियम, विनियम और प्रतिबंध भौतिक स्तर पर होते हैं, लेकिन आध्यात्मिक स्तर पर व्यक्ति को अनुत्तरित ज्ञान से सुसज्जित होना पड़ता है, जो धार्मिक अनुष्ठानों के सिद्धांतों से ऊपर है। सांसारिक धार्मिक गतिविधि को स्मृति-विधि के रूप में जाना जाता है, लेकिन अनुत्तरित भक्ति सेवा को गोस्वामी-विधि कहा जाता है। दुर्भाग्य से कई तथाकथित गोस्वामी स्मृति-विधि के प्लेटफ़ॉर्म पर हैं, फिर भी वे गोस्वामी-विधि के रूप में गुजरने की कोशिश करते हैं, और इस तरह लोगों को ठगा जाता है। गोस्वामी-विधि को सनातन गोस्वामी के हरि-भक्ति-विलास में सख्ती से समझाया गया है, जिसमें कहा गया है:

यथा कांचनतां याति कांस्यं रस-विधानतः

तथा दीक्षा-विधानेन द्विजत्वं जायते नृणां

"रासायनिक हेरफेर द्वारा, पारा से छूने पर घंटी धातु को सोने में बदल दिया जाता है; इसी तरह, जब किसी व्यक्ति को ठीक से दीक्षित किया जाता है, तो वह ब्राह्मण के गुणों को प्राप्त कर सकता है।"

निष्कर्ष यह है कि भक्ति सेवा सभी के लिए खुली है, चाहे उनकी जाति, पंथ, समय और देश कुछ भी हो। यह कृष्ण चेतना आंदोलन इसी सिद्धांत के अनुसार कार्य कर रहा है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)