श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 25: वाराणसी के सारे निवासियों का वैष्णव बनना  »  श्लोक 120
 
 
श्लोक  2.25.120 
‘अभिधेय’ साधन - भक्तिर शुनह विचार ।
सर्व - जन - देश - काल - दशाते व्याप्ति यार ॥120॥
 
 
अनुवाद
“अब कृपया मुझसे भक्ति सेवा की विधि के विषय में सुनिए, जो किसी भी देश में, किसी भी व्यक्ति के लिए, सभी समयों और सभी परिस्थितियों में लागू होती है।
 
Now listen to me about the method of devotion, which is applicable to any country, person, time and situation.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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