श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 25: वाराणसी के सारे निवासियों का वैष्णव बनना  »  श्लोक 107
 
 
श्लोक  2.25.107 
यैछे आमार ‘स्वरूप’, यैछे आमार स्थि ति’ ।
यैछे आमार गुण, कर्म, षड् - ऐश्वर्य - शक्ति ॥107॥
 
 
अनुवाद
'मैं तुम्हें अपना वास्तविक स्वरूप, स्थिति, गुण, कर्म और छह ऐश्वर्य बताऊँगा।'
 
“I will tell you my true nature and my status, my qualities, my actions and my six opulences.”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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