श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 24: आत्माराम श्लोक की 61 व्याख्याएँ  »  श्लोक 98
 
 
श्लोक  2.24.98 
सत्सङ्गान्मुक्त - दुःसङ्गो हातुं नोत्सहते बुधः ।
कीर्त्यमानं यशो यस्य सकृदाकण्यं रोचनम् ॥98॥
 
 
अनुवाद
'जो बुद्धिमान लोग शुद्ध भक्तों की संगति में भगवान को समझ गए हैं और बुरी, भौतिक संगति से मुक्त हो गए हैं, वे भगवान की महिमा सुनने से कभी नहीं बच सकते, भले ही उन्होंने उसे केवल एक बार ही सुना हो।'
 
“Wise people, who have understood the Supreme Lord through the association of pure devotees and who have become free from material misassociation, cannot ignore hearing the glories of the Lord even if they hear it only once.”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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