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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 24: आत्माराम श्लोक की 61 व्याख्याएँ  »  श्लोक 98
 
 
श्लोक  2.24.98 
सत्सङ्गान्मुक्त - दुःसङ्गो हातुं नोत्सहते बुधः ।
कीर्त्यमानं यशो यस्य सकृदाकण्यं रोचनम् ॥98॥
 
 
अनुवाद
'जो बुद्धिमान लोग शुद्ध भक्तों की संगति में भगवान को समझ गए हैं और बुरी, भौतिक संगति से मुक्त हो गए हैं, वे भगवान की महिमा सुनने से कभी नहीं बच सकते, भले ही उन्होंने उसे केवल एक बार ही सुना हो।'
 
“Wise people, who have understood the Supreme Lord through the association of pure devotees and who have become free from material misassociation, cannot ignore hearing the glories of the Lord even if they hear it only once.”
तात्पर्य
यह श्लोक श्रीमद्-भागवतम (1.10.11) का है। कुरुक्षेत्र के युद्ध के बाद जब कृष्ण हस्तिनापुर छोड़कर जा रहे थे, तब कुरुवंश के सभी सदस्यों ने उन्हें श्रद्धा से विदा किया। कृष्ण अपने राज्य जा रहे थे और कुरुवंश के सभी सदस्य उनके जाने से दुखी थे। यह श्लोक इस संदर्भ में सूत गोस्वामी ने कहा था।

एक शुद्ध भक्त भगवान की महिमा सुनकर भगवान के प्रति आकर्षित होता है। भगवान की महिमा और भगवान स्वयं एक ही हैं। इस परम सत्य को समझने के लिए योग्य होना पड़ता है, इसलिए किसी को शुद्ध भक्त के साथ संग करने का मौका दिया जाना चाहिए। हमारा कृष्ण-भावना आंदोलन इसी उद्देश्य के लिए है। हम शुद्ध भक्त बनाना चाहते हैं ताकि अन्य लोग उनके संग से लाभान्वित हों। इस तरह शुद्ध भक्तों की संख्या बढ़ती है। पेशेवर प्रचारक शुद्ध भक्त नहीं बना सकते। श्रीमद्-भागवतम के कई पेशेवर प्रचारक हैं जो अपनी आजीविका कमाने के लिए इस रचना को पढ़ते हैं। हालाँकि, वे भौतिकवादी लोगों को भक्ति सेवा में नहीं बदल सकते। केवल एक शुद्ध भक्त ही दूसरों को शुद्ध भक्ति सेवा में परिवर्तित कर सकता है। इसलिए हमारे कृष्ण-भावना आंदोलन में सभी प्रचारकों के लिए यह महत्वपूर्ण है कि वे पहले शुद्ध भक्त बनें और नियमों का पालन करें, अनैतिक यौन संबंध, मांसाहार, जुआ और नशा से परहेज करें। उन्हें नियमित रूप से अपनी माला पर हरे कृष्ण महामंत्र का जाप करना चाहिए, भक्ति प्रक्रिया का पालन करना चाहिए, सुबह जल्दी उठना चाहिए, मंगल-आरती में शामिल होना चाहिए और नियमित रूप से श्रीमद्-भागवतम और भगवद-गीता का पाठ करना चाहिए। इस तरह कोई शुद्ध हो सकता है और सभी भौतिक प्रदूषणों से मुक्त हो सकता है।

सर्वोपादि-विनिर्मुक्तं तत्-परत्वेन निर्मलम्

हृषीकेण हृषीकेश- सेवनं भक्ति उच्यते

"भक्ति, या भक्ति सेवा का अर्थ है अपनी सभी इंद्रियों को भगवान की सेवा में लगाना, भगवान, जो सर्वोच्च व्यक्तित्व हैं, सभी इंद्रियों के स्वामी हैं। जब आत्मा परम को सेवा प्रदान करती है, तो उसके दो प्रभाव पड़ते हैं। एक सभी भौतिक विभाजनों से मुक्त हो जाता है, और भगवान की सेवा में नियोजित होने से ही इंद्रियाँ शुद्ध हो जाती हैं।" (नारद-पंचरात्र)

भक्ति सेवा का दिखावा करने से कोई मदद नहीं मिलेगी। किसी को भक्ति प्रक्रिया का पालन करने वाला शुद्ध भक्त होना चाहिए, तभी कोई दूसरों को भक्ति सेवा में परिवर्तित कर सकता है। श्री चैतन्य महाप्रभु ने भक्ति सेवा का अभ्यास किया और प्रचार किया (आपनी आचारी' भक्ति करिला प्रचार)। यदि कोई उपदेशक भक्ति सेवा में ठीक से व्यवहार करता है, तो वह दूसरों को परिवर्तित कर सकता है। अन्यथा, उनके प्रचार का कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)