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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 24: आत्माराम श्लोक की 61 व्याख्याएँ  »  श्लोक 94
 
 
श्लोक  2.24.94 
चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन ।
आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ ॥94॥
 
 
अनुवाद
हे भरतश्रेष्ठ (अर्जुन), चार प्रकार के पुण्यात्मा पुरुष मेरी भक्ति करते हैं - दुःखी, धन के इच्छुक, जिज्ञासु और परमज्ञान की खोज करने वाले।
 
“O best of the Bharatas (Arjuna), four kinds of virtuous souls worship me – the distressed, the desirous of wealth, the inquisitive and the seeker of knowledge of the Supreme Absolute.”
तात्पर्य
यह भगवद्-गीता (7.16) से उद्धृत है। इस श्लोक में सुकृतियों शब्द बहुत महत्वपूर्ण है। सु का अर्थ "शुभ" और कृति का अर्थ "गुणी" या "नियमित" है। जब तक कि हम धार्मिक जीवन के विनियमित सिद्धांतों का पालन नहीं करेंगे, तब तक मानव जीवन पशु-जीवन से अलग नहीं है। धार्मिक जीवन का अर्थ है वर्ण और आश्रम के नियमों का पालन करना। विष्णु पुराण में कहा गया है:

वर्णाश्रमाचारवता: पुरुषेण पर: पुमान्

विष्णु: आरध्यते पंथा नान्यत् तत्-तोष-कारणम्

धार्मिक जीवन के अनुसार, समाज को चार सामाजिक वर्णों - ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र - और चार आध्यात्मिक वर्णों - ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और सन्यास में विभाजित किया गया है। जैसे हम इंजीनियर, डॉक्टर या वकील बनने के लिए प्रशिक्षण लेते हैं, उसी प्रकार हमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र बनने के लिए भी प्रशिक्षण लेने की आवश्यकता होती है। जो लोग ठीक से प्रशिक्षित हैं, उन्हें मानव माना जा सकता है; यदि किसी व्यक्ति को सामाजिक और आध्यात्मिक रूप से प्रशिक्षित नहीं किया गया है - अर्थात्, यदि वह अशिक्षित और अनियमित है - तो उसका जीवन पशु-स्तर पर है। पशुओं में आध्यात्मिक उन्नति का कोई प्रश्न नहीं होता है। आध्यात्मिक जीवन उचित प्रशिक्षण द्वारा प्राप्त किया जा सकता है - या तो वर्ण और आश्रम के सिद्धांतों का पालन करके या सीधे भक्ति विद्यालय में श्रवणं कीर्तनं विष्णो: स्मरणं पाद-सेवनम्/ अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यम् आत्म-निवेदनम् की विधियों द्वारा प्रशिक्षित होकर। प्रशिक्षित हुए बिना, कोई सुकृत नहीं बन सकता, शुभ नहीं हो सकता। इस श्लोक में कृष्ण कहते हैं कि लोग संकट में, धन की आवश्यकता में या वास्तव में परम पुरुष, या हर चीज के मूल स्रोत को समझने के लिए उत्सुक होने पर उनके पास आते हैं। कुछ लोग उनके पास पूर्ण सत्य के ज्ञान की खोज में आते हैं, और अन्य उनके पास संकट में आते हैं, जैसे भक्त गजेंद्र। कुछ लोग जिज्ञासु हैं, जैसे शौनक के नेतृत्व वाले महान ऋषि, और अन्य को धन की आवश्यकता है, जैसे ध्रुव महाराज। जब शुकदेव गोस्वामी ने ज्ञान प्राप्त किया तो उन्होंने भगवान से संपर्क किया। इस प्रकार ये सभी महान व्यक्तित्व भगवान कृष्ण, परम पुरुष के भक्ति-मार्ग पर चल पड़े।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)