श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 24: आत्माराम श्लोक की 61 व्याख्याएँ  »  श्लोक 86
 
 
श्लोक  2.24.86 
नायं सुखापो भगवान्देहिनां गोपिका - सुतः ।
ज्ञानिनां चात्म - भूतानां यथा भक्तिमतामिह ॥86॥
 
 
अनुवाद
“‘माता यशोदा के पुत्र भगवान कृष्ण उन भक्तों के लिए सुलभ हैं जो सहज प्रेममयी सेवा में लगे रहते हैं, किन्तु वे मानसिक चिंतन करने वालों, कठोर तपस्या द्वारा आत्म-साक्षात्कार के लिए प्रयत्नशील रहने वालों, या शरीर को आत्मा के समान मानने वालों के लिए उतनी आसानी से सुलभ नहीं हैं।’
 
“The Supreme Personality of Godhead, Krishna, the son of Mother Yashoda, is available to devotees engaged in raganuga prema-bhakti, but He is not so easily accessible to the wise, those who strive for self-realization through severe austerities, or those who consider the body to be equal to the soul.”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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