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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 24: आत्माराम श्लोक की 61 व्याख्याएँ  »  श्लोक 60
 
 
श्लोक  2.24.60 
यैछे तैछे योहि कोहि करये स्मरण ।
चारि - विध ताप तार करे संहरण ॥60॥
 
 
अनुवाद
“जब भक्त किसी न किसी तरह से भगवान का स्मरण सदैव करता है, तो भगवान हरि जीवन की चारों दुःखद स्थितियों को दूर कर देते हैं।
 
“Whenever a devotee always remembers the Supreme Personality of Godhead, wherever and however he may be, then Lord Hari removes the four kinds of sufferings of life.”
तात्पर्य
चार दुखद अवस्थाएँ चार तरह की पापपूर्ण गतिविधियों के कारण होती हैं, जिन्हें (1) पातक, (2) उरु-पातक, (3) महा-पातक और (4) अति-पातक के रूप में जाना जाता है - प्रारंभिक पाप, बहुत महान पाप, बड़ा पाप और सबसे बड़ा पाप। हालाँकि, कृष्ण भक्त को आश्वासन देते हैं, अहं त्वाम सर्व-पापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुकः: "मैं तुम्हें सभी पापपूर्ण प्रतिक्रियाओं से बचाऊंगा। डरो मत।" शब्द सर्व-पापेभ्यो चार प्रकार की पापपूर्ण गतिविधियों को इंगित करता है। जैसे ही भक्त कृष्ण के चरणकमलों की शरण लेता है, वह निश्चित रूप से सभी पापपूर्ण गतिविधियों और उनके परिणामों से मुक्त हो जाता है। चार बुनियादी पापपूर्ण गतिविधियों को अवैध यौन संबंध, नशा, जुआ और मांसाहार के रूप में संक्षेपित किया गया है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)