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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 24: आत्माराम श्लोक की 61 व्याख्याएँ  »  श्लोक 52
 
 
श्लोक  2.24.52 
श्रुत्वा गुणान्भुवन - सुन्दर शृण्वतां ते निर्विश्य कर्ण - विवरैर्हरतोऽङ्ग - तापम् ।
रूपं दृशां दृशिमतामखिलार्थ - लाभं त्वय्यच्युताविशति चित्तमपत्रपं मे ॥52॥
 
 
अनुवाद
हे परम सुंदर कृष्ण, मैंने दूसरों से आपके दिव्य गुणों के बारे में सुना है, इसलिए मेरे सभी शारीरिक कष्ट दूर हो गए हैं। यदि कोई आपके दिव्य सौंदर्य का दर्शन कर लेता है, तो उसकी आँखों ने जीवन में सभी लाभदायक वस्तुएँ प्राप्त कर ली हैं। हे अच्युत! आपके गुणों का श्रवण करके मैं निर्लज्ज हो गया हूँ और आपकी ओर आकर्षित हो गया हूँ।
 
"O most beautiful Krishna, I have heard from others about your transcendental qualities, which have relieved all the pain in my body. If anyone sees your transcendental beauty, his eyes receive all the benefits of life. O infallible one, hearing about your qualities has made me feel shameless and attracted to you."
तात्पर्य
यह श्लोक (श्रीमद भागवतम 10.52.37) रुक्मणीदेवी द्वारा कृष्ण को उनके अपहरण के लिए आमंत्रित करते हुए एक पत्र में लिखा गया था। शुकदेव गोस्वामी ने यह महाराज परीक्षित को तब बताया जब राजा ने उनसे पूछा कि रुक्मणी का अपहरण कैसे हुआ था। रुक्मणी ने कृष्ण के गुणों के बारे में अलग-अलग लोगों से सुना था, और उनके बारे में सुनने के बाद, उसने कृष्ण को अपने पति के रूप में स्वीकार करने का फैसला किया। शिशुपाल से उनकी शादी की हर व्यवस्था हो चुकी थी; इसलिए उसने कृष्ण को एक पत्र लिखा, जिसे उसने एक ब्राह्मण के माध्यम से भेजा, और उसे उसका अपहरण करने के लिए आमंत्रित किया।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)