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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 24: आत्माराम श्लोक की 61 व्याख्याएँ  »  श्लोक 50
 
 
श्लोक  2.24.50 
वीक्ष्यालकावृत - मुखं तव कुण्डल - श्री - गण्ड - स्थलाधर - सुधं हसितावलोकम् ।
दत्ताभयं च भुज - दण्ड - युगं विलोक्य वक्षः श्रियैक - रमणं च भवाम दास्यः ॥50॥
 
 
अनुवाद
"हे कृष्ण, हमने स्वयं को केवल आपकी दासियों के रूप में समर्पित कर दिया है, क्योंकि हमने आपके सुन्दर मुखमंडल को, जो केशों से सुशोभित है, आपके कर्णफूलों को, आपके गालों पर झिलमिलाते आपके अधरों के रस को, और आपकी मुस्कान की सुन्दरता को देखा है। वास्तव में, चूँकि हमने आपकी बाँहों का आलिंगन भी किया है, जो हमें साहस प्रदान करती हैं, और हमने आपके सुन्दर एवं विशाल वक्षस्थल को भी देखा है, इसलिए हमने स्वयं को समर्पित कर दिया है।"
 
"O Krishna, we have surrendered ourselves as your maidservants, for we have seen your beautiful face adorned with locks of hair, your earrings hanging from your cheeks, the nectar of your lips, and the beauty of your gentle smile, and we have been embraced by your courageous arms. Because we have seen your beautiful and expansive chest, we surrender to you."
तात्पर्य
श्रीमद्-भागवतम (10.29.39) का यह श्लोक गोपियों द्वारा तब बोला गया था, जब पूर्णिमा की रात को रासलीला के लिए कृष्ण के पास पहुंची थीं। आकर्षित गोपियां अवाक रह गईं और वे इस बारे में बोलने लगीं कि वे कृष्ण के पास रासलीला का आनंद लेने के लिए कैसे आईं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)