श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 24: आत्माराम श्लोक की 61 व्याख्याएँ  »  श्लोक 354
 
 
श्लोक  2.24.354 
श्री - चैतन्य - नित्यानन्द - अद्वैत - चरण ।
याँर प्रा ण - धन, सेइ पाय एइ धन ॥354॥
 
 
अनुवाद
इन निर्देशों का निष्कर्ष वही जान सकता है जिसका जीवन और आत्मा श्री चैतन्य महाप्रभु, नित्यानंद प्रभु और अद्वैत प्रभु के चरण कमलों में हो।
 
The conclusion of these teachings can be understood only by the one for whom the lotus feet of Sri Chaitanya Mahaprabhu, Nityananda Prabhu and Advaita Prabhu are life and soul.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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