मूर्ति पूजा के खिलाफ विशिष्ट अपराधों को भी नोट किया जाना चाहिए। इनका उल्लेख स्कंद पुराण (अवंती-खंड) में किया गया है, जो कि स्वयं व्यासदेव ने कहा है। व्यक्ति को सभी प्रकार के अपराधों को खत्म करना चाहिए।
शालिग्राम-शिला की पूजा तुलसी के साथ की जानी चाहिए जहां पर्याप्त मात्रा में तुलसी के पत्ते उपलब्ध हों। सभी ISKCON मंदिरों में शालिग्राम-शिला की पूजा शुरू की जानी चाहिए। शालिग्राम-शिला भगवान की दया का रूप है। उल्लिखित साठ-चार मदों के साथ देवता की पूजा करना एक कठिन काम हो सकता है, लेकिन भगवान इतने छोटे हो गए हैं कि किसी भी मंदिर में कोई भी व्यक्ति केवल शालिग्राम-शिला के साथ वही गतिविधियां करके सावधानीपूर्वक मूर्ति पूजा को संभाल सकता है।
देवता के लिए बत्तीस अपराध हैं जिनसे बचा जाना चाहिए। (1) वाहन से मंदिर में प्रवेश नहीं करना चाहिए। मंदिर में प्रवेश करने से पहले जूते और चप्पल उतार देनी चाहिए। (2) जैसे ही वह देवता को देखे, उसे प्रणाम करना चाहिए। (3) स्नान करने के बाद मंदिर में प्रवेश करना चाहिए। दूसरे शब्दों में, व्यक्ति को बहुत साफ होना चाहिए। (4) व्यक्ति को एक हाथ से भगवान को प्रणाम नहीं करना चाहिए। (5) देवताओं के सामने देवताओं की परिक्रमा नहीं करनी चाहिए। (6) व्यक्ति को देवता के सामने अपने पैर नहीं फैलाना चाहिए। (7) व्यक्ति को देवता के सामने अपने पैरों को क्रॉस करके नहीं बैठना चाहिए, और न ही अपने पैरों को अपने हाथों से छूना चाहिए। (8) व्यक्ति को देवता के सामने नहीं लेटना चाहिए। (9) व्यक्ति को देवता के सामने नहीं खाना चाहिए। (10) व्यक्ति को देवता के सामने झूठ नहीं बोलना चाहिए। (11) व्यक्ति को देवता के सामने बहुत जोर से नहीं बोलना चाहिए। (12) व्यक्ति को देवता के सामने बकवास नहीं करनी चाहिए। (13) व्यक्ति को देवता के सामने रोना नहीं चाहिए। (14) व्यक्ति को देवता के सामने दूसरों से व्यवहार नहीं करना चाहिए। (15) व्यक्ति को देवता के सामने कठोर शब्द नहीं बोलने चाहिए। (16) व्यक्ति को खुद को कंबल से नहीं ढंकना चाहिए। (17) व्यक्ति को देवता के सामने दूसरों से ईर्ष्यापूर्वक बात नहीं करनी चाहिए। (18) व्यक्ति को देवता के सामने दूसरों की प्रशंसा नहीं करनी चाहिए। (19) व्यक्ति को देवता के सामने अपशब्दों का प्रयोग नहीं करना चाहिए। (20) व्यक्ति को देवता के सामने हवा नहीं छोड़नी चाहिए। (21) व्यक्ति को मूर्ति पूजा के साठ-चार मदों की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। (22) व्यक्ति को मूर्ति को अर्पित कुछ भी नहीं खाना चाहिए। (23) मौसमी फलों को उपलब्ध होते ही अर्पित करने की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। (24) व्यक्ति को हमेशा देवता को ताजा, अछूता फल अर्पित करना चाहिए। (25) व्यक्ति को अपनी पीठ देवता की ओर करके नहीं बैठना चाहिए। (26) व्यक्ति को देवता के सामने दूसरों को प्रणाम नहीं करना चाहिए। (27) व्यक्ति को आध्यात्मिक गुरु की अनुमति लिए बिना देवता के पास नहीं बैठना चाहिए। (28) व्यक्ति को देवता के सामने अपनी प्रशंसा सुनकर गर्व नहीं करना चाहिए। (29) व्यक्ति को देवताओं की निंदा नहीं करनी चाहिए। (30) व्यक्ति को देवों के सामने दूसरों के साथ निर्दयी नहीं होना चाहिए। (31) व्यक्ति को मंदिर में सभी त्योहारों का पालन करना चाहिए। (32) व्यक्ति को देवता के सामने लड़ाई या झगड़ा नहीं करना चाहिए।
