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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 24: आत्माराम श्लोक की 61 व्याख्याएँ  »  श्लोक 334
 
 
श्लोक  2.24.334 
पञ्च, षोड़श, पञ्चाशत् उपचारे अर्चन ।
पञ्च - काल पूजा आरति, कृष्णेर भोजन - शयन ॥334॥
 
 
अनुवाद
"विग्रह-पूजा का भी वर्णन करें, जिसमें कृष्ण को प्रतिदिन कम से कम पाँच बार भोग लगाना चाहिए और नियत समय पर उन्हें शय्या पर सुलाना चाहिए। आपको पाँच, सोलह या पचास सामग्रियों की सूची के अनुसार आरती और भगवान की पूजा की विधि का भी वर्णन करना चाहिए।"
 
"After this, you must also describe the worship of the Deity, which involves offering food to Krishna at least five times a day; putting Krishna to sleep at specific times. You must also describe the method of worshipping and performing aarti (worship of the Lord) according to a list of five, sixteen, or fifty items."
तात्पर्य
भगवान की पूजा के लिए पाँच सामग्रियाँ हैं: (1) बहुत अच्छे इत्र, (2) बहुत अच्छे पुष्प, (3) धूप, (4) एक दीया और (5) कोई खाने की चीज़। षोडशोपचार के लिए, सोलह सामग्रियाँ चाहिए, और इसमें (1) बैठने के लिए जगह (आसन) देनी चाहिए, (2) कृष्ण को बैठने के लिए निमंत्रण देना चाहिए, (3) अर्घ्य देना चाहिए, (4) पैर धोने के लिए पानी देना चाहिए, (5) मुँह धोना चाहिए, (6) मधु-पर्क देना चाहिए, (7) मुँह धोने के लिए पानी देना चाहिए, (8) प्रभु को स्नान कराना चाहिए, (9) वस्त्र अर्पित करना चाहिए, (10) प्रभु के शरीर को आभूषणों से सजाना चाहिए, (11) अच्छी खुशबू वाले इत्र अर्पित करना चाहिए, (12) गुलाब या चंपा जैसे अच्छी खुशबू वाले पुष्प देना चाहिए, (13) धूप चढाना चाहिए, (14) दीपक जलाना चाहिए, (15) अच्छा भोजन देना चाहिए, और (16) प्रार्थना करनी चाहिए।

हरि-भक्ति-विलास (11 वां विलास, छंद 127-140) में, भगवान की पूजा में क्या आवश्यक है, इसका विस्तृत विवरण है। वहाँ चौंसठ वस्तुओं का उल्लेख है। मंदिर में, पूजा इतनी शानदार होनी चाहिए कि ईश्वर के व्यक्तित्व को संतुष्ट करने के लिए सभी चौंसठ वस्तुएँ उपलब्ध रहनी चाहिए। कभी-कभी सभी चौंसठ वस्तुएँ प्राप्त करना असंभव होता है; इसलिए हम अनुशंसा करते हैं कि कम से कम स्थापना के पहले दिन सभी चौंसठ वस्तुएँ उपलब्ध होनी चाहिए। जब भगवान स्थापित हो जाते हैं, तो सभी चौंसठ वस्तुओं से पूजा जितना संभव हो जारी रहनी चाहिए। चौंसठ वस्तुएँ इस प्रकार हैं: (1) मंदिर के कमरे के सामने एक बड़ी घंटी लटकी होनी चाहिए ताकि जो भी कमरे में आए वह घंटी बजा सके। इस वस्तु को प्रबोधन कहा जाता है, या प्रभु को खुद को समर्पण करना। यह पहली वस्तु है। (2) घंटी बजाते समय भक्त को "जय श्री राधे-गोविंद!" या "जय श्री राधे-माधव!" का उच्चारण करना चाहिए। हर स्थिति में, जय शब्द का उच्चारण किया जाना चाहिए। (3) भगवान को तुरंत प्रणाम करना चाहिए, डंडे की तरह गिरकर। (4) मंदिर में सुबह जल्दी नियमित रूप से मंगल-आरती होनी चाहिए, सूर्योदय से एक घंटा पहले। (5) वेदी के सामने आसन, एक बैठने की जगह होनी चाहिए। यह आसन अध्यात्मिक गुरु के लिए है। शिष्य अध्यात्मिक गुरु के सामने सब कुछ लाता है, और अध्यात्मिक गुरु सब कुछ भगवान को अर्पित करता है। (6) मंगल-आरती के बाद, भगवान को दातून से अपने दाँत साफ करने होते हैं; इसलिए एक दातून अर्पित किया जाना चाहिए। (7) भगवान के पैर धोने के लिए पानी दिया जाना चाहिए। (8) अर्घ्य चढ़ाया जाना चाहिए। (9) आचमन के लिए पानी दिया जाना चाहिए। (10) मधु-पर्क, शहद (थोड़ा घी, थोड़ा पानी, थोड़ी चीनी, दही और दूध) वाला एक छोटा कटोरा दिया जाना चाहिए। इसे मधु-पर्क-आचमन कहा जाता है। (11) भगवान के सामने लकड़ी की चप्पल रखनी चाहिए। (12) भगवान के शरीर की मालिश करनी चाहिए। (13) भगवान के शरीर की तेल से मालिश करनी चाहिए। (14) एक नरम, गीले स्पंज से भगवान के शरीर पर लगे अतिरिक्त तेल को साफ करना चाहिए। (15) भगवान को ऐसे पानी से स्नान कराना चाहिए जिसमें अच्छी खुशबू वाले पुष्पों को कुछ समय तक भिगोया गया हो। (16) भगवान के शरीर को पानी से स्नान कराने के बाद, उन्हें दूध से स्नान कराना चाहिए। (17) फिर उन्हें दही से स्नान कराना चाहिए। (18) फिर उन्हें घी से स्नान कराना चाहिए। (19) फिर उन्हें शहद से स्नान कराना चाहिए। (20) फिर उन्हें ऐसे पानी से स्नान कराना चाहिए जिसमें चीनी घुली हो। (21) फिर भगवान को पानी से धोना चाहिए और इस मंत्र का जाप करना चाहिए:

cintāmaṇi-prakara-sadmasu kalpa-vṛkṣa-

 lakṣāvṛteṣu surabhīr abhipālayantam

lakṣmī-sahasra-śata-sambhrama-sevyamānaṁ

 govindam ādi-puruṣaṁ tam ahaṁ bhajāmi

(22) भगवान के पूरे शरीर को तौलिये से सुखाना चाहिए। (23) भगवान के शरीर पर नया वस्त्र धारण कराना चाहिए। (24) उनके शरीर पर यज्ञोपवीत रखना चाहिए। (25) उनके मुख अवघर्षण के लिए जल अर्पित करना चाहिए (आचमन)। (26) भगवान के शरीर पर तरल चन्दन लुगदी जैसे अच्छे सुगन्धित तेल लगाने चाहिए। (27) उनके शरीर पर सभी प्रकार के आभूषण और मुकुट धारण कराना चाहिए। (28) फिर उन्हें फूलों की माला और सजावटी फूल अर्पित करना चाहिए। (29) अगरबत्ती जानी चाहिए। (30) दीपक अर्पित करना चाहिए। (31) हमेशा सावधानी बरतनी चाहिए ताकि राक्षस और नास्तिक भगवान के शरीर को नुकसान न पहुँचा सकें। (32) भगवान के सामने भोजन अर्पित करना चाहिए। (33) चबाने के लिए मसाले अर्पित करना चाहिए। (34) सुपारी अर्पित करना चाहिए। (35) सही समय पर, व्यवस्था होनी चाहिए ताकि भगवान विश्राम के लिए बिस्तर पर ले जा सकें। (36) भगवान के बालों को संवारा और सजाया जाना चाहिए। (37) प्रथम श्रेणी के वस्त्र अर्पित करना चाहिए। (38) प्रथम श्रेणी का हेलमेट अर्पित करना चाहिए। (39) वस्त्रों को सुगंधित करना चाहिए। (40) कौस्तुभ रत्न और अन्य आभूषण अर्पित करना चाहिए। (41) विभिन्न प्रकार के फूल अर्पित करना चाहिए। (42) एक और मंगल-आरती अर्पित करना चाहिए। (43) दर्पण अर्पित करना चाहिए। (44) भगवान को एक अच्छे पालकी में वेदी पर ले जाना चाहिए। (45) भगवान को सिंहासन पर विराजमान कराना चाहिए। (46) फिर से उनके पैर धोने के लिए जल देना चाहिए। (47) फिर से खाने के लिए कुछ अर्पित करना चाहिए। (48) सायं आरती अर्पित करना चाहिए। (49) भगवान को चँवर से हवा करनी चाहिए, और उनके सिर पर छत्र रखना चाहिए। (50) हरे कृष्ण मंत्र और स्वीकृत गीतों को गाना चाहिए। (51) संगीत वाद्ययंत्र बजाने चाहिए। (52) देवता के सामने नृत्य करना चाहिए। (53) देवता की परिक्रमा करनी चाहिए। (54) फिर से प्रणाम करना चाहिए। (55) भगवान के चरण कमलों पर विभिन्न प्रकार की प्रार्थना और स्तुति करना चाहिए। (56) व्यक्ति को अपने सिर से भगवान के चरण कमलों को छूना चाहिए। यह हर किसी के लिए संभव नहीं हो सकता है, लेकिन कम से कम पूजारी को यह करना चाहिए। (57) पिछले दिन चढ़ाए गए फूलों को अपने सिर से स्पर्श करना चाहिए। (58) भगवान के भोजन के अवशेष ग्रहण करना चाहिए। (59) भगवान के सामने बैठकर यह सोचना चाहिए कि वह भगवान के पैरों की मालिश कर रहा है। (60) भगवान के विश्राम करने से पहले उनके बिस्तर को फूलों से सजाना चाहिए। (61) भगवान को अपना हाथ अर्पित करना चाहिए। (62) देवता को उनके बिस्तर पर ले जाना चाहिए। (63) भगवान के पैर धोना चाहिए और फिर उन्हें बिस्तर पर बैठाना चाहिए। (64) भगवान को बिस्तर पर रखना चाहिए और फिर उनके पैरों की मालिश करना चाहिए।

देवताओं को दिन में पांच बार आरती अर्पित करनी चाहिए - सूर्योदय से पहले सुबह-सुबह, बाद में सुबह, मध्यान्ह, शाम को और रात में। इसका मतलब है कि पूजा और वस्त्र और फूल बदलने चाहिए। जहां खाद्य पदार्थों का संबंध है, सभी वस्तुओं को प्रथम श्रेणी की तैयारी होनी चाहिए। प्रथम श्रेणी का चावल, दाल, फल, मीठा चावल, सब्जियां और विभिन्न प्रकार के भोजन चूसने, पीने और चबाने के लिए होना चाहिए। देवताओं को अर्पित किए जाने वाले सभी खाद्य पदार्थ असाधारण रूप से उत्कृष्ट होने चाहिए। यूरोप और अमेरिका में वर्तमान में कोई मौद्रिक कमी नहीं है। लोग गरीब नहीं हैं, और यदि वे देवता पूजा के इन सिद्धांतों का पालन करते हैं, तो वे आध्यात्मिक जीवन में उन्नति करेंगे। जहाँ तक देवता को बिस्तर पर रखने की बात है, यदि देवता बड़े और भारी हैं, तो उन्हें रोजाना हिलाना संभव नहीं है। यह बेहतर है कि एक छोटी देवमूर्ति, जिसकी पूजा भी की जाती है, को बिस्तर पर ले जाया जाए। इस मंत्र का जाप करना चाहिए: आगच्छ शयन-स्थानं प्रियाभिः सह केशव। "हे केशव, कृपया श्रीमती राधारानी के साथ अपने बिस्तर पर आएं।" (हरि-भक्ति-विलास 11.40)

देवता को श्रीमती राधारानी के साथ बिस्तर पर सुलाना चाहिए, और वेदी से लकड़ी की चप्पल को बेडसाइड पर लाकर इस बात का संकेत देना चाहिए। जब देवता लेटे हों, तो उनके पैरों की मालिश करनी चाहिए। देवता को लेटाने से पहले, उन्हें दूध और चीनी का एक बर्तन अर्पित करना चाहिए। इस गाढ़े दूध को लेने के बाद, देवता को लेट जाना चाहिए और उन्हें चबाने के लिए सुपारी और मसाले चढ़ाना चाहिए।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)