महा-भागवता श्रेष्टो ब्राह्मणो वै गुरु नृणां
सर्वेषाँ एव लोकानां असौ पूज्यो यथा हरिः
महा-कुल-प्रसूतः अपि सर्व-यज्ञेषु दीक्षितः
सहस्र-शाखाध्यायी च न गुरुः स्याद् अवैष्णवः
गुरु भक्ति मार्ग में सबसे ऊपर होना चाहिए। भक्तों के तीन वर्ग होते हैं और गुरु को सर्वोच्च वर्ग से स्वीकार किया जाना चाहिए। प्रथम श्रेणी के भक्त सभी तरह के लोगों के लिए आध्यात्मिक गुरु होते हैं। यह कहा जाता है कि, गुरु नृणां। नृणां शब्द का अर्थ है "सभी मनुष्यों का।" गुरु केवल किसी विशेष समूह तक सीमित नहीं होता है। रूप गोस्वामी के उपदेशामृत में कहा गया है कि गुरु एक गोस्वामी है, जो इंद्रियों और मन का संचालक होता है। ऐसा गुरु दुनिया भर से शिष्य स्वीकार कर सकता है। पृथ्वीं स शिष्यात। यही गुरु की परीक्षा है।
भारत में कई तथाकथित गुरु हैं, और वे एक निश्चित जिले या प्रांत तक ही सीमित हैं। वे भारत में यात्रा तक नहीं करते, फिर भी वे खुद को जगत-गुरु घोषित करते हैं, जो पूरे विश्व के गुरु होते हैं। ऐसे धोखेबाज गुरुओं को स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए। कोई भी देख सकता है कि कैसे वास्तविक आध्यात्मिक गुरु दुनिया भर से शिष्य स्वीकार करते हैं। गुरु एक योग्य ब्राह्मण है; इसलिए वह ब्रह्म और परब्रह्म को जानता है। इस प्रकार वह अपना जीवन परब्रह्म की सेवा में समर्पित कर देते हैं। दुनिया भर से शिष्य स्वीकार करने वाले वास्तविक आध्यात्मिक गुरु की पूजा भी दुनिया भर में उनके गुणों के कारण की जाती है। लोकानाँ असौ पूज्यो यथा हरिः: दुनिया के लोग उसकी पूजा उसी तरह करते हैं जैसे वे भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व की पूजा करते हैं। ये सभी सम्मान उसे इसलिए दिए जाते हैं क्योंकि वह ब्राह्मणवादी सिद्धांतों का सख्ती से पालन करता है और इन सिद्धांतों को अपने शिष्यों को सिखाता है। ऐसे व्यक्ति को आचार्य कहा जाता है क्योंकि वह भक्ति सेवा के सिद्धांतों को जानता है, वह स्वयं उसी तरह से व्यवहार करता है, और वह अपने शिष्यों को अपने नक्शे कदम पर चलने के लिए सिखाता है। इस प्रकार वह एक आचार्य या जगत-गुरु है। भले ही कोई व्यक्ति ब्राह्मण परिवार में पैदा हुआ हो और यज्ञ करने में बहुत कुशल हो, लेकिन अगर वह कट्टर वैष्णव नहीं है तो उसे गुरु के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता है। गुरु योग्यता से एक ब्राह्मण होता है, और वह दूसरों को शास्त्रीय सिद्धांतों और ब्राह्मणवादी योग्यताओं के अनुसार ब्राह्मण बना सकता है। ब्राह्मणवाद वंशानुगत होने का सवाल नहीं है। श्रीमद-भागवतम (7.11.35) में श्री नारद मुनि महाराज युधिष्ठिर को बताते हैं कि ब्राह्मण क्या होता है। वह बताते हैं कि अगर ब्राह्मणवादी गुण क्षत्रिय, वैश्य या यहाँ तक कि शूद्रों में देखे जाते हैं, तो उन्हें ब्राह्मण के रूप में स्वीकार करना चाहिए। इस संबंध में, श्रील श्रीधर स्वामी ने टिप्पणी की है: शमादिभिर एव ब्राह्माणादि-व्यवहारो मुख्यः, न जाति-मात्रादित्य आह — यसेति। यद् यदि अन्यत्र वर्णाँतरे अपि दृश्येत, तद्-वर्णाँतरं तेनैव लक्षण-निमित्तेनैव वर्णेन विनिर्दिशेत, न तु जाति-निमित्तेनेत्यर्थः: " किसी के साथ ब्राह्मण या किसी अन्य वर्ण के सदस्य के रूप में व्यवहार करने का निर्णय लेने के लिए सबसे महत्वपूर्ण मानदंड आत्म-संयम और इसी तरह के ब्राह्मणवादी गुणों की उपस्थिति या अनुपस्थिति है। हमें मुख्य रूप से जन्म जैसी सतही विशेषताओं के अनुसार निर्णय नहीं करना चाहिए। यह यस्य [भागवतम् 7.11.35] से शुरू होने वाली कविता में कहा गया है। यदि एक वर्ण के गुण किसी अन्य में पैदा हुए व्यक्ति में देखे जाते हैं, तो उसे उसके गुणों के वर्ण के अनुसार निर्दिष्ट किया जाना चाहिए, न कि उसके जन्म के अनुसार।"
महाभारत के एक टीकाकार, नीलकंठ द्वारा भी ऐसा ही एक कथन दिया गया है: शूद्रो अपि शमाद्य-उपेतो ब्राह्मण एव ब्राह्मणो अपि कामदार्य-उपेतः शूद्र एव। "हालांकि कोई शूद्र परिवार में पैदा हुआ हो, लेकिन अगर वह शमा [मन पर नियंत्रण] से शुरू होने वाले ब्राह्मणवादी गुणों से संपन्न है, तो उसे ब्राह्मण के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए। हालांकि कोई ब्राह्मण परिवार में पैदा हुआ हो, लेकिन अगर वह काम [वासना] से शुरू होने वाले गुणों से संपन्न है, तो उसे शूद्र माना जाना चाहिए।" किसी को भी केवल ब्राह्मण परिवार में जन्म लेने के आधार पर खुद को ब्राह्मण नहीं कहना चाहिए। व्यक्ति को शास्त्रों, विशेष रूप से भगवद-गीता (18.42) में वर्णित ब्राह्मणवादी गुणों से योग्य होना चाहिए:
शमो दमः तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च।
ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम्।।
''शांति, संयम, तप, पवित्रता, सहनशीलता, ईमानदारी, ज्ञान, विवेक और श्रद्धा-ये वे स्वाभाविक गुण हैं, जिनसे ब्राह्मण कार्य करते हैं।''
जब तक कोई व्यक्ति इन सभी गुणों से सुसज्जित नहीं हो जाता, तब तक उसे ब्राह्मण के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता। यह केवल ब्राह्मण परिवार में जन्म लेने का प्रश्न नहीं है। इस संबंध में, श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर कहते हैं कि नरोत्तम दास ठाकुर और श्यामानंद गोस्वामी, यद्यपि ब्राह्मण परिवारों में जन्म नहीं लिए थे, फिर भी उन्हें वास्तविक आध्यात्मिक गुरु के रूप में स्वीकार किया जाता है क्योंकि वे योग्यता से ब्राह्मण थे। श्री गंगा-नारायण, रामकृष्ण और कई अन्य व्यक्ति, जो वास्तव में ब्राह्मण परिवारों में पैदा हुए थे, नरोत्तम दास ठाकुर और श्यामानंद गोस्वामी को अपने आध्यात्मिक गुरु के रूप में स्वीकार करते थे।
महा-भागवत वह है जो अपने शरीर को तिलक से सजाता है और जिसका नाम उसे कृष्ण का सेवक होने का संकेत देता है, शब्द ''दास'' द्वारा। उसे एक वास्तविक आध्यात्मिक गुरु द्वारा दीक्षित भी किया जाता है और वह देवता की पूजा करने, मंत्रों का सही उच्चारण करने, यज्ञ करने, भगवान को प्रार्थना करने और संकीर्तन करने में निपुण है। वह जानता है कि भगवान की सर्वोच्च विभूति की सेवा कैसे की जाती है और वैष्णव का सम्मान कैसे किया जाता है। जब कोई महा-भागवत की सर्वोच्च स्थिति प्राप्त कर लेता है, तो उसे गुरु के रूप में स्वीकार किया जाना है और भगवान की विभूति हरि की तरह ही पूजा की जाती है। केवल ऐसा व्यक्ति ही गुरु के पद पर रहने के योग्य है। हालाँकि, यदि कोई अत्यधिक योग्य है लेकिन वैष्णव नहीं है, तो उसे गुरु के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता। जब तक कोई वैष्णव नहीं होता, तब तक वह ब्राह्मण नहीं हो सकता। यदि कोई वैष्णव है, तो वह पहले से ही ब्राह्मण है। यदि कोई गुरु पूर्ण रूप से वैष्णव के रूप में योग्य है, तो उसे ब्राह्मण के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए, भले ही वह ब्राह्मण परिवार में पैदा न हुआ हो। जब यह वास्तविक आध्यात्मिक गुरु पर लागू होता है, तो जन्म से ब्राह्मण को अलग करने की जाति व्यवस्था पद्धति स्वीकार्य नहीं है। आध्यात्मिक गुरु एक योग्य ब्राह्मण और आचार्य है। यदि कोई योग्य ब्राह्मण नहीं है, तो वह वैदिक साहित्यों का अध्ययन करने में निपुण नहीं है। नाना-शास्त्र-विचरणैक-निपुणौ। प्रत्येक वैष्णव एक आध्यात्मिक गुरु होता है, और एक आध्यात्मिक गुरु ब्राह्मण व्यवहार में स्वतः ही निपुण होता है। वह वैदिक शास्त्रों को भी समझता है।
इसी तरह, आध्यात्मिक गुरु द्वारा शिष्य को अपना शिष्य बनाने से पहले उसके गुणों को देखना चाहिए। कृष्ण चेतना आंदोलन में, अपेक्षा यह है कि व्यक्ति पापपूर्ण जीवन के चार स्तंभों-अवैध यौन संबंध, मांसाहार, नशा और जुआ को त्यागने के लिए तैयार होना चाहिए। विशेष रूप से पश्चिमी देशों में, हम पहले देखते हैं कि क्या कोई संभावित शिष्य नियमित सिद्धांतों का पालन करने के लिए तैयार है। फिर उसे एक वैष्णव सेवक का नाम दिया जाता है और कम से कम सोलह बार दैनिक हरि कृष्ण महा-मंत्र का जाप करने के लिए दीक्षित किया जाता है। इस तरह शिष्य आध्यात्मिक गुरु या उनके प्रतिनिधि के मार्गदर्शन में कम से कम छह महीने से एक साल तक भक्ति सेवा प्रदान करता है। इसके बाद उसे दूसरे दीक्षा के लिए अनुशंसित किया जाता है, जिसके दौरान एक पवित्र धागा दिया जाता है और शिष्य को सच्चे ब्राह्मण के रूप में स्वीकार किया जाता है। श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर ने एक वास्तविक वैष्णव को पवित्र धागा देने की प्रणाली शुरू की, और हम उनके नक्शेकदम पर चल रहे हैं। एक वास्तविक शिष्य की योग्यताओं का वर्णन श्रीमद-भागवतम् (11.10.6) में इस प्रकार है:
अमान्य-मत्सरः दक्षः निर्ममः दृढ़-सौहृदः।
असतवरः अर्थ-जिज्ञासुरः अनसूयुर अमोघ-वाक्।।
शिष्य में निम्नलिखित गुण होने चाहिए। उसे भौतिक शारीरिक अवधारणा में रुचि त्यागनी चाहिए। उसे भौतिक वासना, क्रोध, लोभ, भ्रम, पागलपन और ईर्ष्या को त्यागना चाहिए। उसे केवल ईश्वर के विज्ञान को समझने में रुचि होनी चाहिए, और उसे इस मामले में सभी बातों पर विचार करने के लिए तैयार रहना चाहिए। उसे अब यह नहीं सोचना चाहिए कि "मैं यह शरीर हूँ" या "यह चीज़ मेरी है।" आध्यात्मिक गुरु से अटूट आस्था से प्रेम किया जाना चाहिए और बहुत स्थिर और निश्चल होना चाहिए। वास्तविक शिष्य आध्यात्मिक विषय को समझने के लिए जिज्ञासु होना चाहिए। उसे अच्छे गुणों में दोष नहीं खोजना चाहिए, और उसे भौतिक विषयों में रुचि नहीं रहनी चाहिए। उसकी एकमात्र रुचि कृष्ण, भगवान का सर्वोच्च व्यक्तित्व होना चाहिए।
जहाँ तक आध्यात्मिक गुरु और शिष्य की पारस्परिक परीक्षा का संबंध है, श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर बताते हैं कि एक वास्तविक शिष्य आध्यात्मिक विषय को समझने के लिए बहुत जिज्ञासु होना चाहिए। जैसा कि श्रीमद्-भागवतम (11.3.21) में कहा गया है:
तस्माद् गुरुं प्रपद्येत
जिज्ञासुः श्रेय उत्तमम्
"जो जीवन के सर्वोच्च लक्ष्य और लाभ को समझने के लिए जिज्ञासु है, उसे एक वास्तविक आध्यात्मिक गुरु के पास जाना चाहिए और उसके सामने आत्मसमर्पण करना चाहिए।" एक गंभीर शिष्य को एक वास्तविक आध्यात्मिक गुरु का चयन करते समय सतर्क रहना चाहिए। उसे यह सुनिश्चित करना चाहिए कि आध्यात्मिक गुरु सभी पारलौकिक आवश्यकताओं को पूरा कर सके। आध्यात्मिक गुरु को यह देखना चाहिए कि शिष्य कितना जिज्ञासु है और वह आध्यात्मिक विषय को समझने के लिए कितना उत्सुक है। आध्यात्मिक गुरु को शिष्य की जिज्ञासा का कम से कम छह महीने या एक वर्ष तक अध्ययन करना चाहिए। एक आध्यात्मिक गुरु को केवल उसके भौतिक वैभव के कारण किसी शिष्य को स्वीकार करने के लिए बहुत उत्सुक नहीं होना चाहिए। कभी-कभी कोई बड़ा व्यवसायी या जमींदार दीक्षा के लिए किसी आध्यात्मिक गुरु के पास जा सकता है। जो भौतिक रूप से रूचि रखते हैं उन्हें विषयी (कर्मियों) कहा जाता है, जो दर्शाता है कि वे इंद्रिय सुख के बहुत शौकीन हैं। ऐसे विषयी कभी-कभी एक प्रसिद्ध गुरु के पास जाते हैं और केवल फैशन के एक मामले के रूप में शिष्य बनने के लिए कहते हैं। कभी-कभी विषयी किसी प्रतिष्ठित आध्यात्मिक गुरु के शिष्य के रूप में प्रस्तुत होते हैं, बस अपनी गतिविधियों को ढँकने और खुद को आध्यात्मिक ज्ञान में उन्नत के रूप में विज्ञापित करने के लिए। दूसरे शब्दों में, वे भौतिक सफलता प्राप्त करना चाहते हैं। एक आध्यात्मिक गुरु को इस संबंध में बहुत सावधान रहना चाहिए। ऐसा व्यवसाय पूरी दुनिया में चल रहा है। आध्यात्मिक गुरु भौतिक रूप से संपन्न शिष्य को यह तथ्य विज्ञापित करने के लिए स्वीकार नहीं करता कि उसके पास इतना बड़ा शिष्य है। वह जानता है कि ऐसे विषयी शिष्यों के साथ जुड़ने से वह पतन कर सकता है। जो विषयी शिष्य को स्वीकार करता है वह वास्तविक आध्यात्मिक गुरु नहीं है। वह भले ही हो, लेकिन एक बेईमान विषयी के साथ संगति के कारण उसकी स्थिति को नुकसान हो सकता है। यदि कोई तथाकथित आध्यात्मिक गुरु अपने व्यक्तिगत लाभ या भौतिक लाभ के लिए शिष्य को स्वीकार करता है, तो आध्यात्मिक गुरु और शिष्य के बीच का संबंध भौतिक संबंध में बदल जाता है, और आध्यात्मिक गुरु स्मार्त-गुरु जैसा हो जाता है। कई जाति गोस्वामी पेशेवर रूप से कुछ शिष्य बनाते हैं जो उनकी या उनके निर्देशों की परवाह नहीं करते। ऐसे आध्यात्मिक गुरु केवल अपने शिष्यों से कुछ भौतिक लाभ प्राप्त करने के लिए संतुष्ट होते हैं। श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर द्वारा ऐसे संबंध की निंदा की जाती है, जो ऐसे आध्यात्मिक गुरुओं और शिष्यों को धोखेबाजों और ठगे जाने वालों का समाज कहते हैं। उन्हें बौल या प्राकृत-सहजिया भी कहा जाता है। उनका उद्देश्य आध्यात्मिक गुरु और शिष्य के बीच के संबंध को बहुत सस्ती चीज़ बनाना है। वे आध्यात्मिक जीवन को समझने के लिए गंभीर नहीं हैं।
चैतन्य-चरितामृत के इस श्लोक में सेव्य भगवान शब्द महत्वपूर्ण हैं। भगवान भगवान विष्णु, भगवान का सर्वोच्च व्यक्तित्व को इंगित करता है। अकेले भगवान विष्णु ही पूजनीय हैं। देवताओं की पूजा करने की कोई आवश्यकता नहीं है। इसकी पुष्टि भगवद-गीता (7.20) में की गई है:
कामै स्तैस्तैर हृता-ज्ञानाः
प्रपद्यन्तेऽन्य-देवताः
तं तं नियममास्थाय
प्रकृत्या नियताः स्वया
"जिनकी बुद्धि भौतिक इच्छाओं से चुरा ली गई है वह देवताओं के प्रति समर्पण करते हैं और अपनी प्रकृति के अनुसार उपासना के विशेष नियमों का पालन करते हैं।"
स्कंद पुराण में भी कहा गया है:
वासुदेवं परित्यज्य योऽन्य-देवं उपासते
स्व-मातरं परित्यज्य श्व-पचीं वंदते हि सः
"एक व्यक्ति जो देवताओं की पूजा करता है और भगवान वासुदेव को त्याग देता है, वह उस मनुष्य की तरह है जो अपनी मां की सुरक्षा छोड़कर किसी चुड़ैल की शरण में चला जाता है।"
भगवान कृष्ण ने भी भगवद-गीता (9.23) में कहा है:
येऽप्यन्यदेवता भक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विताः
तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधि-पूर्वकम्
"जो अन्य देवताओं के भक्त हैं और श्रद्धा के साथ उनकी पूजा करते हैं, वे वास्तव में केवल मुझे ही पूजते हैं, हे कुंती के पुत्र, लेकिन वे गलत तरीके से ऐसा करते हैं।"
देवता भी जीवित प्राणी हैं और कृष्ण के अंश हैं। इसलिए एक अर्थ में जब कोई देवताओं की पूजा करता है तो वह कृष्ण की पूजा करता है, लेकिन सही तरीके से नहीं। पेड़ को पानी देने के लिए एक उचित तरीका है: किसी को जड़ को पानी देना चाहिए। लेकिन अगर कोई इसके बजाय पत्तियों और शाखाओं को पानी देता है, तो वह केवल अपना समय बर्बाद कर रहा है। यदि कोई भगवान विष्णु को छोड़कर देवताओं की पूजा करता है, तो उसका प्रतिफल केवल भौतिक होगा। जैसा कि भगवान कृष्ण ने भगवद-गीता (7.23) में पुष्टि की है:
अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसां
देवान् देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि
"छोटी बुद्धि के लोग देवताओं की पूजा करते हैं, और उनके फल सीमित और अस्थायी होते हैं। जो लोग देवताओं की पूजा करते हैं वे देवताओं के ग्रहों में जाते हैं, लेकिन मेरे भक्त अंततः मेरे सर्वोच्च ग्रह पर पहुँचते हैं।"
देवता पूजा मूर्ख पुरुषों के लिए है क्योंकि देवता पूजा से प्राप्त होने वाले सभी लाभ भौतिक, अस्थायी और वापस लेने योग्य हैं। पद्म पुराण में भी कहा गया है:
यस्तु नारायणं देवं ब्रह्म-रुद्रादि-दैवतैः
समत्वेनैव वीक्षेत स पाषण्डी भवेद् ध्रुवं
"जो कोई भी भगवान विष्णु और देवताओं को समान स्तर पर समझता है, उसे आध्यात्मिक समझ के संबंध में तुरंत दुष्ट माना जाना चाहिए।"
भौतिक जगत में प्रकृति के तीन गुण हैं, लेकिन जब कोई आध्यात्मिक रूप से स्थित होता है, तो वह भौतिक गुणों से ऊपर होता है, भले ही वह इस भौतिक जगत में निवास करता हो। जैसा कि भगवान कृष्ण ने भगवद-गीता (14.26) में कहा है:
मां च योऽव्यभिचारेण भक्ति-योगेन सेवते
स गुणान् समतीत्यैतान ब्रह्म-भूयाय कल्पते
"जो पूर्ण भक्ति सेवा में संलग्न रहता है, सभी परिस्थितियों में अविचलित होकर, वह भौतिक प्रकृति के गुणों को पार कर जाता है और इस प्रकार ब्रह्म के स्तर पर आ जाता है।" हालाँकि, भौतिक चेतना में, यहाँ तक कि जो सद्गुण में स्थित है, वह भी रजोगुण और तमोगुण के प्रदूषण के लिए अतिसंवेदनशील होता है। जब सद्गुण रजोगुण के साथ मिश्रित होता है, तो व्यक्ति सूर्य-देव, विवस्वान की पूजा करता है। जब सद्गुण तमोगुण के साथ मिश्रित होता है, तो व्यक्ति गणपति या गणेश की पूजा करता है। जब रजोगुण तमोगुण के साथ मिश्रित होता है, तो व्यक्ति दुर्गा या काली, बाहरी शक्ति की पूजा करता है। जब कोई केवल तमोगुण में होता है, तो वह भगवान शिव का भक्त बन जाता है क्योंकि भगवान शिव इस भौतिक जगत के भीतर तमोगुण के प्रमुख देवता हैं। हालाँकि, जब कोई भौतिक प्रकृति के सभी गुणों के प्रभाव से पूरी तरह मुक्त हो जाता है, तो वह भक्ति मंच पर एक शुद्ध वैष्णव बन जाता है। जैसा कि श्रीला रूप गोस्वामी ने भक्ति-रसामृत-सिंधु में कहा है:
अन्याभिलाषिता-शून्यं ज्ञान-कर्माद्य-अनावृतम्
आनुकूल्येन कृष्णानु- शीलनं भक्तिरुत्तमा
"किसी को भौतिक लाभ या फलदायी गतिविधियों या दार्शनिक अटकलों के माध्यम से लाभ या लाभ की इच्छा के बिना परम भगवान कृष्ण को अनुकूल और बिना इच्छा के भक्तिपूर्ण सेवा प्रदान करनी चाहिए। इसे शुद्ध भक्ति सेवा कहा जाता है।"
विशुद्ध-सत्व की स्थिति अछूते अच्छाई की स्थिति है। उस मंच पर कोई तब समझ सकता है, अराध्यो भगवान व्रजेशा-तनयस्तद्-धाम वृंदावनम: "परमेश्वर, नंद महाराज के पुत्र, उनकी दिव्य निवासस्थान, वृंदावन के साथ पूजे जाने हैं।"
श्री चैतन्य-चरितामृत के वर्तमान छंद में सर्व-मंत्र-विचारण का अर्थ है "सभी प्रकार के मंत्रों पर विचार करना।" विभिन्न प्रकार के भक्तों के लिए अलग-अलग प्रकार के मंत्र होते हैं। द्वादशाक्षर मंत्र के नाम से जाना जाने वाला मंत्र है, जिसमें बारह अक्षर होते हैं, और अठारह अक्षरों वाला मंत्र भी होता है। इसी तरह, नरसिंह मंत्र, राम मंत्र, गोपाल मंत्र आदि हैं। प्रत्येक मंत्र का अपना आध्यात्मिक महत्व होता है। आध्यात्मिक गुरु को अपने शिष्य की विभिन्न मंत्रों का जाप करने की क्षमता के अनुसार उसके लिए एक मंत्र चुनना होता है।
