सूत्र करि’ दिशा यदि करह उपदेश ।
आपने करह यदि हृदये प्रवेश ॥326॥
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अनुवाद
तब सनातन गोस्वामी ने भगवान से प्रार्थना की, "कृपया मुझे स्वयं बताएँ कि मैं वैष्णव आचरण पर यह कठिन ग्रंथ कैसे लिख सकता हूँ। कृपया मेरे हृदय में स्वयं को प्रकट करें।"
Sanatana Goswami then requested Mahaprabhu, "Please tell me yourself how to write this difficult treatise on Vaishnava conduct. Please appear in my heart."
तात्पर्य
वैष्णव साहित्य का लेखन साधारण पुरुषों का कार्य नहीं है। वैष्णव साहित्य मानसिक कल्पनाएँ नहीं होती हैं। वे सभी अधिकृत साहित्य स्वरूप हैं जो उनका मार्गदर्शन करने वाले थे जो वैष्णव बनने जा रहे हैं। इन परिस्थितियों में कोई साधारण व्यक्ति अपनी राय नहीं दे सकता। उनकी राय हमेशा वैदिक सिद्धांतों के निष्कर्ष के अनुरूप होनी चाहिए। जब तक कि कोई पूर्ण रूप से वैष्णव व्यवहार में योग्य न हो और किसी उच्च अधिकारी (भगवान श्रीकृष्ण) द्वारा अधिकृत न हो, तब तक कोई भी वैष्णव साहित्य, श्रीमद-भागवतम और भगवद-गीता पर टिप्पणी और विवरण नहीं लिख सकता।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥