कोई भी श्रीमद्-भागवतम् को तभी समझ सकता है जब वह कृष्ण के दीवाने श्री चैतन्य महाप्रभु के नक्शे कदम पर चले। बेशक, हम श्री चैतन्य महाप्रभु की नकल नहीं कर सकते हैं। यह संभव नहीं है। हालांकि, जब तक कोई कृष्ण को समझने के लिए बहुत गंभीर नहीं है, वह श्रीमद्-भागवतम् को नहीं समझ सकता है। श्रीमद्-भागवतम् कृष्ण की पारलौकिक गतिविधियों का पूरा वर्णन देता है। पहले नौ खंड बताते हैं कि कृष्ण कौन हैं, और भगवान का जन्म और गतिविधियाँ दसवें खंड में वर्णित हैं। भगवद-गीता में कहा गया है, जन्म कर्म च मे दिव्यम। कृष्ण का प्रकट होना और अंतर्धान होना सांसारिक नहीं, पारलौकिक है। एक व्यक्ति घर लौटने यानी भगवान के पास वापस जाने के योग्य है, यदि वह कृष्ण और उनके प्रकट होने और अंतर्धान होने को पूरी तरह से समझता है। यह स्वयं कृष्ण द्वारा भगवद-गीता (4.9) में सत्यापित किया गया है: त्याक्त्वा देहं पुनर् जन्म नैति मां एति सोऽर्जुन।
इसलिए यह निष्कर्ष निकाला गया है कि किसी को श्रीमद्-भागवतम् और भगवद-गीता से कृष्ण के बारे में सीखना है, और किसी को श्री चैतन्य महाप्रभु के नक्शे कदम पर चलना है। जो लोग श्री चैतन्य महाप्रभु का अनुसरण नहीं करते हैं वे भगवद-गीता और श्रीमद्-भागवतम् को नहीं समझ सकते।
