Warning: Undefined array key 1 in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 93

Deprecated: nl2br(): Passing null to parameter #1 ($string) of type string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 97
श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 24: आत्माराम श्लोक की 61 व्याख्याएँ  »  श्लोक 323
 
 
श्लोक  2.24.323 
आमा - हेन येबा केह ‘बातुल’ हय ।
एइ - दृष्टे भागवतेर अर्थ जानय ॥323॥
 
 
अनुवाद
“यदि कोई मेरे जैसा पागल हो जाए, तो वह भी इस प्रक्रिया से श्रीमद्भागवतम् का अर्थ समझ सकता है।”
 
“If someone becomes as mad as I am, then by this method he too can understand the meaning of Srimad Bhagavatam.”
तात्पर्य
श्री चैतन्य महाप्रभु स्पष्ट तौर पर बताते हैं कि श्रीमद्-भागवतम् को वे लोग नहीं समझ सकते हैं जो भौतिक रूप से स्थित हैं। दूसरे शब्दों में, किसी को श्री चैतन्य महाप्रभु की तरह पागल बनना होगा। भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व होने के अलावा, श्री चैतन्य महाप्रभु एक आचार्य हैं जिन्होंने भगवान के लिए एक पागल की तरह प्यार का प्रदर्शन किया। उनकी अपनी लिखी हुई कविता के अनुसार, युगायितं निमेषेण। वे कहते हैं कि उनके लिए, "एक पल बारह साल तक चलने जैसा लगता है।" चक्षुषा प्रावृषायितम्: "मेरे आंसू बारिश की मूसलाधार धाराओं की तरह बह रहे हैं।" शून्यायितं जगत् सर्वम्: "मुझे ऐसा लगता है जैसे पूरा ब्रह्मांड खाली है।" क्यों? गोविंद-विरहेण मे: "गोविंद, कृष्ण से अलग होने के कारण।"

कोई भी श्रीमद्-भागवतम् को तभी समझ सकता है जब वह कृष्ण के दीवाने श्री चैतन्य महाप्रभु के नक्शे कदम पर चले। बेशक, हम श्री चैतन्य महाप्रभु की नकल नहीं कर सकते हैं। यह संभव नहीं है। हालांकि, जब तक कोई कृष्ण को समझने के लिए बहुत गंभीर नहीं है, वह श्रीमद्-भागवतम् को नहीं समझ सकता है। श्रीमद्-भागवतम् कृष्ण की पारलौकिक गतिविधियों का पूरा वर्णन देता है। पहले नौ खंड बताते हैं कि कृष्ण कौन हैं, और भगवान का जन्म और गतिविधियाँ दसवें खंड में वर्णित हैं। भगवद-गीता में कहा गया है, जन्म कर्म च मे दिव्यम। कृष्ण का प्रकट होना और अंतर्धान होना सांसारिक नहीं, पारलौकिक है। एक व्यक्ति घर लौटने यानी भगवान के पास वापस जाने के योग्य है, यदि वह कृष्ण और उनके प्रकट होने और अंतर्धान होने को पूरी तरह से समझता है। यह स्वयं कृष्ण द्वारा भगवद-गीता (4.9) में सत्यापित किया गया है: त्याक्त्वा देहं पुनर् जन्म नैति मां एति सोऽर्जुन।

इसलिए यह निष्कर्ष निकाला गया है कि किसी को श्रीमद्-भागवतम् और भगवद-गीता से कृष्ण के बारे में सीखना है, और किसी को श्री चैतन्य महाप्रभु के नक्शे कदम पर चलना है। जो लोग श्री चैतन्य महाप्रभु का अनुसरण नहीं करते हैं वे भगवद-गीता और श्रीमद्-भागवतम् को नहीं समझ सकते।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)