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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 24: आत्माराम श्लोक की 61 व्याख्याएँ  »  श्लोक 285
 
 
श्लोक  2.24.285 
‘आत्मा’ - शब्दे कहे - सर्व - विध भगवान् ।
एक ‘स्वयं भगवान्’, आर ‘भगवान्’ - आख्यान ॥285॥
 
 
अनुवाद
"आत्मा" शब्द भगवान के सभी विभिन्न स्वरूपों को दर्शाता है। उनमें से एक स्वयं भगवान कृष्ण हैं, और अन्य कृष्ण के विभिन्न अवतार या अंश हैं।
 
"The word 'soul' denotes all the various parts of the Supreme Personality of Godhead. One of these is the Supreme Personality of Godhead, Krishna Himself, and the rest are the various incarnations or parts of Krishna."
तात्पर्य
आत्मा शब्द में भगवान के नाम से जानी जाने वाली सभी प्रकार की विभूतियाँ भी सम्मिलित हैं। इसका तात्पर्य यह है कि कृष्ण के असीम विस्तार हैं। यह ब्रह्म-संहिता (5.46) में वर्णित है:

दीपार्चिर एव हि दशान्तरमभ्युपेत्य

 दीपायते विवृता-हेतु-समना-धर्मा

यस तादृग एव हि च विष्णुतया विभाति

 गोविन्दम आदि-पुरुषं तम अहम भजामी

इस प्रकार कृष्ण के विस्तारों की तुलना उन मोमबत्तियों से की जाती है जिन्हें मूल मोमबत्ती से जलाया गया है। सभी गौण मोमबत्तियाँ समान रूप से शक्तिशाली होती हैं, लेकिन मूल मोमबत्ती वह होती है जिससे अन्य सभी को जलाया गया है। कृष्ण मूल परम पुरुष हैं, और वे बलराम, संकर्षण, अनिरुद्ध, प्रद्युम्न और वासुदेव के रूप में विस्तारित होते हैं। इस प्रकार असंख्य अवतार और विस्तार हैं जिन्हें भगवान, परम पुरुष के रूप में भी जाना जाता है।

भागवान के नाम से जानी जाने वाली विभिन्न विभूतियों के संबंध में, श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर कहते हैं कि कृष्ण के रूप में जाना जाने वाला परमेश्वर परम पुरुष हैं और उनके विस्तारों को भी परमेश्वर कहा जाता है। दूसरे शब्दों में, कृष्ण, परमेश्वर, अन्य सभी परमेश्वरों के मूल हैं। निराधार दार्शनिक और रहस्यवादी योगी भी कृष्ण के स्वरूप का ध्यान करते हैं, लेकिन यह स्वरूप मूल परम पुरुष का स्वरूप नहीं है। इस प्रकार का भगवान भगवान की पूर्ण शक्ति का मात्र एक आंशिक प्रतिनिधित्व है। फिर भी, उन्हें भी परम पुरुष के रूप में समझा जाना चाहिए। इस मामले को स्पष्ट करने के लिए, किसी को केवल इतना समझना चाहिए कि वृंदावन में नंद महाराज के पुत्र, ग्वालों के मित्र और गोपियों के प्रिय कृष्ण वास्तव में मूल परम पुरुष हैं। वह सहज प्रेम द्वारा प्राप्त होते हैं। यद्यपि उनके विस्तार को भी परम पुरुष कहा जाता है, परन्तु उन्हें केवल विधिवत भक्ति सेवा के निष्पादन द्वारा ही प्राप्त किया जाता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)