एत अन्न ना पाठाओ, किछु कार्य नाइ ।
सबे दुइ - जनार योग्य भक्ष्य - मात्र चाइ ॥280॥
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अनुवाद
“पूर्व शिकारी ने कहा, ‘कृपया इतना अनाज मत भेजिए। केवल उतना ही भेजिए जितना दो लोगों के लिए पर्याप्त हो, इससे ज़्यादा नहीं।’
"The former hunter said, 'Please don't send so much food. Just enough for the two of us, no more.'"
तात्पर्य
भूतपूर्व शिकारी केवल दो व्यक्तियों को खाने के लिए पर्याप्त मात्रा में भोजन चाहता था, इससे अधिक नहीं। वैष्णव के लिए यह आवश्यक नहीं है कि वह अगले दिन के लिए भोजन का भंडारण करें। उसे केवल एक दिन चलने के लिए पर्याप्त अनाज ही प्राप्त करना चाहिए। अगले दिन, उसे फिर से भगवान की दया पर निर्भर रहना होगा। यही श्री चैतन्य महाप्रभु का निर्देश है। जब उनके व्यक्तिगत सेवक गोविंद कभी-कभी हरिताकी (मीरोबलन) का भंडारण करते थे, तो श्री चैतन्य महाप्रभु उन्हें यह कहते हुए दंडित करते थे, "तुमने अगले दिन के लिए भंडारण क्यों किया?" श्रील रूप गोस्वामी और अन्य अपने भरण-पोषण के लिए प्रतिदिन घर-घर भीख मांगते थे, और उन्होंने कभी भी अगले दिन के लिए अपने आश्रम में भोजन का भंडारण करने का प्रयास नहीं किया। हमें भौतिक रूप से गणना नहीं करनी चाहिए, यह सोचकर, "एक सप्ताह के लिए भोजन का भंडारण करना बेहतर है। भगवान को प्रतिदिन भोजन लाने के लिए परेशान क्यों करें?" हमें आश्वस्त होना चाहिए कि भगवान प्रतिदिन प्रदान करेंगे। अगले दिन के लिए भोजन का भंडारण करने की कोई आवश्यकता नहीं है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥