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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 24: आत्माराम श्लोक की 61 व्याख्याएँ  »  श्लोक 279
 
 
श्लोक  2.24.279 
नारद कहे , - ‘वैष्णव, तोमार अन्न किछु आय?’ ।
व्याध कहे, “यारे पाठाओ, सेइ दिया याय” ॥279॥
 
 
अनुवाद
तब नारद मुनि ने शिकारी से पूछा, 'हे वैष्णव, क्या तुम्हारे पास अपने भरण-पोषण के लिए कुछ आय है?'
 
“Then Narada Muni asked the hunter, ‘O Vaishnava, do you have any income to sustain yourself?’ The hunter replied, “O Guru, whoever you send, whenever he comes to meet me, gives me something.”
तात्पर्य
'शिकारी ने उत्तर दिया, 'हे मेरे प्रिय आध्यात्मिक गुरु, आप जिसे भी भेजते हैं वह मेरे पास आने पर मुझे कुछ न कुछ देता है।'

इससे भगवद्गीता (9.22) के कथन की पुष्टि होती है कि भगवान अपने वैष्णव भक्तों के लिए सभी आवश्यक वस्तुएँ स्वयं वहन करते हैं। नारद मुनि ने उस पूर्व शिकारी से पूछा कि उसकी आजीविका कैसे चल रही थी, और उसने उत्तर दिया कि हर कोई जो उससे मिलने आता था, वह उसके लिए भरण-पोषण के लिए कुछ न कुछ ले आता था। कृष्ण, जो हर किसी के हृदय में विराजमान हैं, कहते हैं, "मैं व्यक्तिगत रूप से एक वैष्णव के लिए सभी आवश्यक वस्तुएँ वहन करता हूँ।" वह किसी को भी यह करने का आदेश दे सकते हैं। हर कोई एक वैष्णव को कुछ देने को तैयार होता है, और यदि एक वैष्णव पूरी तरह से भक्ति सेवा में लगा हुआ है, तो उसे अपने भरण-पोषण की चिंता करने की आवश्यकता नहीं है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)