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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 24: आत्माराम श्लोक की 61 व्याख्याएँ  »  श्लोक 277
 
 
श्लोक  2.24.277 
देखिया व्याधेर प्रेम पर्वत - महामुनि ।
नारदेरे कहे , - तुमि हओ स्पर्श - मणि ॥277॥
 
 
अनुवाद
जब पर्वत मुनि ने शिकारी के प्रेमपूर्ण भावों को देखा तो उन्होंने नारद से कहा, 'निश्चय ही तुम कसौटी हो।'
 
“When Parvat Muni saw the signs of the hunter's passionate love, he said to Narada, 'You are certainly the Sparshmani.'
तात्पर्य
ज्यों पारस परसे लोहा, लोहा होवे सोना। नारद मुनि को परावत मुनि ने पारस कहा है क्यूँकि उनके स्पर्श से ही वह शिकारी जो मनुष्यों में नीच था, उन्नत और पक्का वैष्णव हो गया। श्रील भक्तिविनोद ठाकुर कहते हैं कि वैष्णव की स्थिति को यह देखकर परखा जा सकता है कि वह कितना अच्छा पारस है - अर्थात् यह देखकर कि उसने अपने जीवनकाल में कितने वैष्णव बनाये हैं। वैष्णव तो पारस ही होना चाहिए, जिससे वह अपने प्रचार से लोगों को वैष्णव धर्म में परिणित कर सके, भले ही लोग शिकारी के समान पतित क्‍यों न हों। ऐसे कई स्वयं को उन्नत भक्त कहते हैं जो अपना ही भला करने के लिए एकांत जगह बैठ जाते हैं। वे लोगों को प्रचार करके वैष्णव बनाने के लिए बाहर नहीं जाते और इसलिए उन्‍हें स्‍पर्श-मणि, उन्नत भक्त तो कदापि नहीं कहा जा सकता। कनिष्‍ठ अधिकारी भक्त दूसरों को वैष्णव नहीं बना सकते, परंतु एक मध्‍यम अधिकारी वैष्णव ऐसा प्रचार करके कर सकता है। श्री चैन्‍य महाप्रभु ने अपने अनुयायियों को वैष्‍णवों की संख्‍या बढ़ाने के लिए सलाह दी है।

यारे देख, तारे कह 'कृष्ण'-उपदेश

आमार आज्ञाय गुरु हाँ ताँरा' एइ देश

(चै.मध्‍य 7.128)

श्री चैन्‍य महाप्रभु की यही इच्‍छा है कि हर कोई वैष्‍णव और गुरु बने। श्री चैन्‍य महाप्रभु और उनकी शिष्‍य परंपरा के निर्देशों का पालन करके कोई भी गुरु बन सकता है, क्‍योंकि प्रक्रिया बहुत आसान है। कोई भी कृष्‍ण के निर्देशों का प्रचार करने के लिए हर जगह जा सकता है। भगवद्गीता कृष्‍ण के निर्देश हैं; इसलिए हर वैष्‍णव का कर्तव्‍य है कि वह भगवद्गीता का प्रचार करे और यात्रा करे, फिर भले ही वह अपने देश में या किसी दूसरे देश में हो। नारद मुनि के चरणों पर चलना ही स्‍पर्श-मणि की कसौटी है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)