जल आ नि’ भक्त्ये दोंहार पाद प्रक्षालिल ।
सेइ जल स्त्री - पुरुषे पिया शिरे लइल ॥275॥
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अनुवाद
फिर वह जल लेकर आया और बड़ी श्रद्धा से ऋषियों के चरण धोए। फिर पति-पत्नी दोनों ने वह जल पिया और अपने सिर पर छिड़का।
"Then he brought water and, with great devotion, washed the sages' feet with it. The husband and wife then drank the water and sprinkled it on their heads."
तात्पर्य
यह वो प्रक्रिया है जिसका अनुसरण किसी आध्यात्मिक गुरु या आध्यात्मिक गुरु के स्तर पर पहुंचे किसी व्यक्ति के आने पर किया जाना चाहिए। जब आध्यात्मिक गुरु अपने शिष्यों के घर आते हैं तो शिष्यों को पुराने शिकारी के कदमों पर चलना चाहिए। दीक्षा से पहले व्यक्ति का क्या स्वरूप था यह मायने नहीं रखता। दीक्षा के बाद दी गई शिष्टाचार को सीखना चाहिए।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥