ग्रामे ध्वनि हैल , - व्याध वैष्ण व’ हइल ।
ग्रामेर लोक सब अन्न आनिते लागिल ॥266॥
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अनुवाद
"यह खबर कि शिकारी वैष्णव बन गया है, पूरे गाँव में फैल गई। सभी गाँववाले भिक्षा लेकर उस वैष्णव को, जो पहले शिकारी था, भेंट करने लगे।
"The news spread throughout the village that the hunter had become a Vaishnav. All the villagers began bringing alms and giving them to the Vaishnav who had previously been a hunter."
तात्पर्य
संत, वैष्णव या ब्राह्मण के पास जाते समय जनता का यह कर्तव्य है कि उन्हें उपहार भेंट करे। प्रत्येक वैष्णव कृष्ण पर निर्भर है और कृष्ण जीवन की सभी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए तैयार हैं, बशर्ते कि वैष्णव आध्यात्मिक गुरु द्वारा निर्धारित सिद्धांतों का पालन करें। हमारी कृष्ण चेतना आंदोलन में निश्चित रूप से कई गृहस्थ हैं। वे आंदोलन में शामिल होते हैं और समाज के केंद्रों में रहते हैं, लेकिन अगर वे इस अवसर का लाभ उठाते हैं और काम नहीं करते हैं बल्कि आंदोलन की कीमत पर जीते हैं, प्रसादम खाते हैं और बस सोते हैं, तो वे खुद को बहुत खतरनाक स्थिति में डाल लेते हैं। इसलिए यह सलाह दी जाती है कि गृहस्थ मंदिर में न रहें। उन्हें मंदिर के बाहर रहना चाहिए और खुद का भरण-पोषण करना चाहिए। बेशक, यदि गृहस्थ पूरी तरह से प्राधिकरणों के निर्देशों के अनुसार भगवान की सेवा में लगे हुए हैं, तो उनके मंदिर में रहने में कोई बुराई नहीं है। किसी भी मामले में, मंदिर खाने और सोने की जगह नहीं होनी चाहिए। मंदिर प्रबंधक को इन बातों का बहुत ध्यान रखना चाहिए।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥