आमि तोमाय बहु अन्न पाठाइमु दिने ।
सेइ अन्न लबे, यत खाओ दुइ - जने ॥262॥
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अनुवाद
नारद मुनि ने आगे कहा, 'मैं तुम दोनों के लिए प्रतिदिन पर्याप्त भोजन भेजूँगा। तुम जितना चाहो उतना भोजन ले सकते हो।'
“Narada Muni further said, ‘I will send enough food to both of you every day, so that you can eat as per your wish.’
तात्पर्य
जब कोई व्यक्ति कृष्ण चेतना में आ जाता है, तो भौतिक ज़रूरतों की परवाह करने की ज़रूरत नहीं होती है। कृष्ण कहते हैं, योग-क्षेमं वहाम्य अहं: "मैं व्यक्तिगत रूप से अपने भक्तों की सभी ज़रूरतों को पूरा करता हूँ।" तो ज़िंदगी की ज़रूरतों के बारे में चिंतित क्यों होना चाहिए? सिद्धांत यह होना चाहिए कि व्यक्ति को ज़रूरत से ज़्यादा कुछ नहीं चाहिए। नारद मुनि शिकारी को सलाह देते हैं कि वह अपने लिए और अपनी पत्नी के लिए केवल उतना ही स्वीकार करें जो ज़रूरी हो। भक्त को हमेशा सावधान रहना चाहिए कि वह केवल उन्हीं चीज़ों का उपभोग करें जिनकी उसे ज़रूरत है और अनावश्यक ज़रूरतें पैदा न करें।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥