घरे गिया ब्राह्मणे देह’ यत आछे धन ।
एक एक वस्त्र परि’ बाहिर हओ दुइ - जन ॥259॥
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अनुवाद
"तब नारद मुनि ने शिकारी को सलाह दी, 'घर लौट जाओ और जो भी धन तुम्हारे पास है उसे उन शुद्ध ब्राह्मणों में बाँट दो जो परम सत्य को जानते हैं। ब्राह्मणों में अपना सारा धन बाँटने के बाद, तुम और तुम्हारी पत्नी घर से निकल जाओ और तुम दोनों केवल एक वस्त्र धारण करो।'
"Then the sage Narada advised the hunter, 'Return home and distribute all your wealth among the pure Brahmins who know the ultimate truth. After distributing your wealth to the Brahmins, you and your wife should each take a pair of clothes to wear and leave home.'
तात्पर्य
यह वानप्रस्थ की अवस्था में त्याग की प्रक्रिया है। कुछ समय गृहस्थ जीवन का आनंद लेने के बाद पति-पत्नी को घर छोड़कर अपनी संपत्ति ब्राह्मण और वैष्णवों को दान कर देनी चाहिए। कोई अपने पति को वानप्रस्थ की अवस्था में साथी के रूप में रख सकता है। विचार यह है कि पत्नी अपने पति को आध्यात्मिक उन्नति में सहायता करेगी। इसलिए नारद मुनि ने शिकारी को वानप्रस्थ जीवन को अंगीकृत करने और घर छोड़ने को कहा। ऐसा नहीं है कि एक गृहस्थ को तब तक घर में रहना चाहिए जब तक कि वह मरता नहीं। वानप्रस्थ संन्यास की एक प्रारंभिक अवस्था है। कृष्ण चेतना आंदोलन में कई युवा जोड़े हैं जो भगवान की सेवा में लगे हैं। अंततः, वे वानप्रस्थ लेने वाले हैं और वानप्रस्थ की अवस्था के बाद पति उपदेश देने के लिए संन्यास ले सकता है। पत्नी फिर अकेली रह सकती है और देवता की सेवा कर सकती है या कृष्ण चेतना आंदोलन के भीतर अन्य गतिविधियों में संलग्न हो सकती है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥