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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 24: आत्माराम श्लोक की 61 व्याख्याएँ  »  श्लोक 258
 
 
श्लोक  2.24.258 
धनुक भाङ्गि’ व्याध ताँर चरणे पड़िल ।
तारे उठा ञा नारद उपदेश कैल ॥258॥
 
 
अनुवाद
"महान् नारद मुनि द्वारा इस प्रकार आश्वस्त किए जाने पर, शिकारी ने अपना धनुष तोड़ दिया, तुरंत संत के चरणकमलों पर गिर पड़ा और पूर्ण समर्पण कर दिया। इसके बाद, नारद मुनि ने उसे अपने हाथ से उठाया और आध्यात्मिक उन्नति के लिए निर्देश दिए।
 
"Thus reassured by Narada Muni, the hunter broke his bow, immediately fell at the saint's feet, and surrendered himself completely. Narada Muni then lifted him up with his own hands and preached spiritual progress."
तात्पर्य
हि यही दीक्षा लेने की प्रक्रिया है। शिष्य को अध्यात्मिक गुरु के प्रति समर्पण करना चाहिए जो कि कृष्ण के प्रतिनिधि हैं। नाभाद मुनी से आने वाले शिष्य -क्रम में होने के कारण, अध्यात्मिक गुरु, नाभाद मुनी के समाना है। एक व्यक्ति अपने पाप कर्मों से मुक्त हो सकता है यदि वह उस व्यक्ति के चरण कमलों में समर्पण करता है जो वास्तव में नाभाद मुनी का प्रतिनिधित्व करता है। नाभाद मुनी ने उस शिकारी को निर्देश दिए जब शिकारी ने आत्मसमर्पण कर दिया।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)