यह दीक्षा की प्रक्रिया है। शिष्य को यह व्रत लेना चाहिए कि वह अब पापमय कार्य नहीं करेगा - अर्थात अवैध यौन संबंध, मांस खाना, जुआ और नशा करना। वह गुरु की आज्ञा का पालन करने का वादा करता है। फिर गुरु उसकी देखभाल करता है और उसे आध्यात्मिक मुक्ति की ओर ले जाता है।
