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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 24: आत्माराम श्लोक की 61 व्याख्याएँ  »  श्लोक 254
 
 
श्लोक  2.24.254 
एइ पाप याय मोर, केमन उपाये ? ।
निस्तार करह मोरे, पड़ों तोमार पाये ॥254॥
 
 
अनुवाद
शिकारी बोला, 'हे महाराज, कृपया मुझे बताएँ कि मैं अपने पापमय जीवन के कर्मों से कैसे मुक्ति पा सकता हूँ। अब मैं पूर्णतः आपके शरणागत हूँ और आपके चरणकमलों में नतमस्तक हूँ। कृपया मुझे पापमय जीवन के कर्मों से मुक्ति दिलाएँ।'
 
"The hunter continued, 'O noble one, please tell me how I can be freed from the consequences of my sinful life. I now surrender completely to you and fall at your feet. Please deliver me from the consequences of my sinful actions.'"
तात्पर्य
नारद मुनि की कृपा से उस शिकारी के होश बहाल हुए और उसने तुरंत संत के चरणों में आत्मसमर्पण कर दिया। यही प्रक्रिया है। एक संत-जन के साथ संगति करने से ही व्यक्ति अपने पापपूर्ण जीवन की प्रतिक्रियाओं को समझने में सक्षम होता है। जब कोई स्वेच्छा से संत-जन के प्रति आत्मसमर्पण करता है जो कि कृष्ण का प्रतिनिधि होता है और उसके निर्देशों का पालन करता है, तो वह पापपूर्ण प्रतिक्रियाओं से मुक्त हो जाता है। कृष्ण पापी व्यक्ति से समर्पण की मांग करते हैं, और कृष्ण के प्रतिनिधि भी यही शिक्षा देते हैं। कृष्ण का प्रतिनिधि अपने शिष्य से कभी नहीं कहता, "मेरे प्रति आत्मसमर्पण करो।" बल्कि वह कहता है, "कृष्ण के प्रति समर्पण करो।" यदि शिष्य इस सिद्धांत को स्वीकार कर लेता है और कृष्ण के प्रतिनिधि के माध्यम से आत्मसमर्पण कर देता है तो उसका जीवन बच जाता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)