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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 24: आत्माराम श्लोक की 61 व्याख्याएँ  »  श्लोक 252
 
 
श्लोक  2.24.252 
नारद - सड़े व्याधेर मन परसन्न हइल ।
ताँर वाक्य शुनि’ मने भय उपजिल ॥252॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार, महामुनि नारद की संगति से शिकारी को अपने पाप कर्म का थोड़ा-सा बोध हुआ। अतः वह अपने अपराधों के कारण कुछ भयभीत हो गया।
 
"Thus, through the company of the sage Narada, the hunter began to admit to his sins to some extent. Thus, he became somewhat afraid of his crimes."
तात्पर्य
यह एक शुद्ध भक्त के साथ संबंध रखने का असर है। हमारे उपदेशक जो पूरी दुनिया में कृष्ण चेतना का उपदेश दे रहे हैं उन्हें नारद मुनि के पदचिन्हों का अनुसरण करना चाहिए और चारों सिद्धांतों का पालन करते हुए और हरि कृष्ण महा-मंत्र का जाप करते हुए पवित्र होना चाहिए। इससे वे वैष्णव बनने के योग्य बन जाएँगे। फिर, जब वे पापी लोगों से इस कृष्ण चेतना आंदोलन की शिक्षाओं के बारे में बात करेंगे, लोग प्रभावित होंगे और निर्देशों को स्वीकार करेंगे। हम ऋषि-परम्परा के माध्यम से भक्ति सेवा में शिक्षा प्राप्त करते हैं। नारद मुनि हमारे मूल गुरु हैं क्योंकि वे व्यासदेव के आध्यात्मिक गुरु हैं। व्यासदेव हमारी ऋषि-परम्परा के आध्यात्मिक गुरु हैं; इसलिए हमें नारद मुनि के पदचिन्हों का अनुसरण करना चाहिए और एक शुद्ध वैष्णव बनना चाहिए। एक शुद्ध वैष्णव वह है जिसका कोई दूसरा इरादा नहीं है। उसने अपने आप को पूरी तरह से भगवान की सेवा में समर्पित कर दिया है। उसकी कोई भौतिक इच्छा नहीं है और उसकी तथाकथित सीखने और परोपकारी कार्य में कोई रूचि नहीं है। तथाकथित विद्वान विद्वान और परोपकारी वास्तव में कर्मि और ज्ञानी हैं और कुछ वास्तव में पापी गतिविधि में लिप्त कंजूस हैं। सभी की निंदा की जाती है क्योंकि वे भगवान कृष्ण के भक्त नहीं हैं।

इस कृष्ण चेतना आंदोलन के साथ जुड़कर और नियमों और कायदों का सख्ती से पालन करके हर किसी को शुद्ध होने का मौका मिलता है। हरि कृष्ण महा-मंत्र का जाप करके, कोई भी सभी प्रदूषण से मुक्त हो सकता है, विशेष रूप से जानवरों के वध से होने वाले प्रदूषण से। भगवान कृष्ण स्वयं अनुरोध करते हैं:

सर्व-धर्मन परित्यज्य माम एक शरणं व्रज

अहं त्वाम सर्व-पापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः

“सभी प्रकार के धर्मों को त्याग दो और बस मेरे शरण में आ जाओ। मैं तुम्हें सभी पापपूर्ण प्रतिक्रियाओं से मुक्त कर दूंगा। डरो मत।”(गीता 18.66)

हमें कृष्ण से यह निर्देश लेना चाहिए और ऋषि-परंपरा में नारद मुनि के पदचिन्हों का अनुसरण करना चाहिए। अगर हम बस कृष्ण के कमल चरणों में समर्पण कर दें और इस कृष्ण चेतना आंदोलन को गंभीरता से लें, तो हम पाप से होने वाले कर्म से मुक्त हो सकते हैं। अगर हम पर्याप्त बुद्धिमान हैं, तो हम प्रभु की प्रेममय सेवा में लग जाएँगे। फिर हमारा जीवन सफल होगा और हमें शिकारी की तरह जीवन के बाद जीवन तक कष्ट नहीं उठाना पड़ेगा। जानवरों को मारने से, न केवल हम मानव रूप से वंचित रह जाएँगे, बल्कि हमें एक पशु रूप धारण करना होगा और किसी न किसी तरह उसी प्रकार के जानवर द्वारा मारा जाना होगा जिस प्रकार हमने मारा है। यह प्रकृति का नियम है। संस्कृत शब्द मांस का अर्थ है "मांस"। यह कहा गया है, मांस सः खदति इति मांसः। अर्थात्, "अभी मैं एक जानवर का मांस खा रहा हूँ जो भविष्य में किसी दिन मेरा मांस खाएगा।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)