इस कृष्ण चेतना आंदोलन के साथ जुड़कर और नियमों और कायदों का सख्ती से पालन करके हर किसी को शुद्ध होने का मौका मिलता है। हरि कृष्ण महा-मंत्र का जाप करके, कोई भी सभी प्रदूषण से मुक्त हो सकता है, विशेष रूप से जानवरों के वध से होने वाले प्रदूषण से। भगवान कृष्ण स्वयं अनुरोध करते हैं:
सर्व-धर्मन परित्यज्य माम एक शरणं व्रज
अहं त्वाम सर्व-पापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः
“सभी प्रकार के धर्मों को त्याग दो और बस मेरे शरण में आ जाओ। मैं तुम्हें सभी पापपूर्ण प्रतिक्रियाओं से मुक्त कर दूंगा। डरो मत।”(गीता 18.66)
हमें कृष्ण से यह निर्देश लेना चाहिए और ऋषि-परंपरा में नारद मुनि के पदचिन्हों का अनुसरण करना चाहिए। अगर हम बस कृष्ण के कमल चरणों में समर्पण कर दें और इस कृष्ण चेतना आंदोलन को गंभीरता से लें, तो हम पाप से होने वाले कर्म से मुक्त हो सकते हैं। अगर हम पर्याप्त बुद्धिमान हैं, तो हम प्रभु की प्रेममय सेवा में लग जाएँगे। फिर हमारा जीवन सफल होगा और हमें शिकारी की तरह जीवन के बाद जीवन तक कष्ट नहीं उठाना पड़ेगा। जानवरों को मारने से, न केवल हम मानव रूप से वंचित रह जाएँगे, बल्कि हमें एक पशु रूप धारण करना होगा और किसी न किसी तरह उसी प्रकार के जानवर द्वारा मारा जाना होगा जिस प्रकार हमने मारा है। यह प्रकृति का नियम है। संस्कृत शब्द मांस का अर्थ है "मांस"। यह कहा गया है, मांस सः खदति इति मांसः। अर्थात्, "अभी मैं एक जानवर का मांस खा रहा हूँ जो भविष्य में किसी दिन मेरा मांस खाएगा।"
