Warning: Undefined array key 1 in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 93

Deprecated: nl2br(): Passing null to parameter #1 ($string) of type string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 97
श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 24: आत्माराम श्लोक की 61 व्याख्याएँ  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  2.24.25 
‘कुर्वन्ति’ - पद एइ परस्मैपद हय ।
कृष्ण - सुख - निमित्त भजने तात्पर्य कहय ॥25॥
 
 
अनुवाद
"कुर्वन्ति" शब्द का अर्थ है 'वे दूसरों के लिए कुछ करते हैं,' क्योंकि यह क्रिया 'करना' का एक रूप है जो दूसरों के लिए किए गए कार्यों को इंगित करता है। इसका प्रयोग भक्ति सेवा के संबंध में किया जाता है, जो कृष्ण की संतुष्टि के लिए की जानी चाहिए। यही 'कुर्वन्ति' शब्द का तात्पर्य है।
 
“The word ‘kurvanti’ means they do something for others. Since ‘do’ is a verb, it indicates ‘action done for others.’ It is used in the context of devotional service performed to please Krishna. This is the meaning of the word ‘kurvanti’.”
तात्पर्य
संस्कृत में 'करने' की क्रिया के दो रूप हैं, तकनीकी रूप से इन्हें परस्मैपद और आत्मनेपद कहा जाता है। जब चीजें व्यक्तिगत संतुष्टि के लिए की जाती हैं, तो उसे आत्मनेपद कहा जाता है। उस स्थिति में, अंग्रेजी में "करना" शब्द संस्कृत में कुर्वते है। जब दूसरों के लिए चीजें की जाती हैं, तो क्रिया रूप बदलकर कुर्वन्ति हो जाता है। इस प्रकार श्री चैतन्य महाप्रभु ने सनातन गोस्वामी को सूचित किया कि आत्मराम छंद में कुर्वन्ति क्रिया का अर्थ है कि चीजें केवल कृष्ण की संतुष्टि के लिए ही की जानी चाहिए। इसका समर्थन व्याकरणविद पाणिनि ने किया है। जब कार्य स्वयं के लाभ के लिए किया जाना है, तो क्रिया आत्मनेपद के रूप में होती है, और जब यह दूसरों के लिए किया जाता है, तो इसे परस्मैपद कहा जाता है। इस प्रकार क्रिया इस आधार पर बनती है कि कुछ स्वयं की संतुष्टि के लिए किया जाता है या दूसरे की संतुष्टि के लिए।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)