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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 24: आत्माराम श्लोक की 61 व्याख्याएँ  »  श्लोक 249
 
 
श्लोक  2.24.249 
नारद कहे, “अर्ध मारिले जीव पाय व्यथा ।
जीवे दुःख दितेछ, तोमार हइबे ऐछे अवस्था” ॥249॥
 
 
अनुवाद
नारद मुनि ने उत्तर दिया, 'यदि आप जानवरों को अधमरा छोड़ देते हैं, तो आप जानबूझकर उन्हें पीड़ा दे रहे हैं। इसलिए आपको प्रतिशोध स्वरूप कष्ट सहना होगा।'
 
"Narada Muni replied, 'If you leave animals half dead, you knowingly cause them pain. Therefore, you will have to suffer in return.'"
तात्पर्य
तथापि अगर कोई सभ्य व्यक्ति अपने सभ्यता के तथाकथित रखरखाव के लिए वैज्ञानिक पद्धतियों और मशीनों का उपयोग करते हुए नियमित रूप से जानवरों को मारता है, तो उसके लिए जो भोगों की प्रतीक्षा है, उसका अनुमान भी नहीं लगाया जा सकता। तथाकथित सभ्य लोग शिक्षा में अपने आप को बहुत आगे मानते हैं, परन्तु ये प्रकृति के कठोर नियमों के बारे में नहीं जानते हैं। प्रकृति के कानून के अनुसार, एक जीवन एक जीवन के लिए है। हम मुश्किल से उस व्यक्ति के दुखों की कल्पना कर सकते हैं जो एक बूचड़खाने का रखरखाव करता है। वह न केवल इस जीवन में दुख झेलता है, बल्कि अपने अगले जीवन में भी झेलता है। यह कहा जाता है कि एक शिकारी, हत्यारा या हत्यारे को न तो जीने और न ही मरने की सलाह दी जाती है। यदि वह रहता है, तो वह और भी अधिक पापों को जमा करता है, जो भविष्य के जीवन में और अधिक दुख लाते हैं। उसे मरने की सलाह इसलिए नहीं दी जाती क्योंकि उसके मरने का मतलब है कि वह तुरंत और अधिक दुख सहने लगता है। इसलिए उसे न जीने और न ही मरने की सलाह दी जाती है।

वैदिक सिद्धांतों के अनुयायी होने के नाते, हम इस संबंध में नारद मुनि के बयानों को स्वीकार करते हैं। यह हमारा कर्तव्य है कि हम देखें कि किसी को भी पापपूर्ण गतिविधियों के कारण पीड़ा न हो। मूर्ख बदमाशों को भगवद-गीता में मायापहृत-ज्ञानः के रूप में वर्णित किया गया है, जो इंगित करता है कि यद्यपि वे सतही रूप से शिक्षित हैं, माया ने उनका वास्तविक ज्ञान छीन लिया है। ऐसे लोग वर्तमान में मानव समाज का नेतृत्व कर रहे हैं। श्रीमद् भागवतम् में उन्हें अंधो यथां धैर उपनीयमानाः के रूप में वर्णित किया गया है। ये बदमाश स्वयं अंधे होते हैं, और फिर भी वे दूसरों को नेतृत्व प्रदान कर रहे हैं जो अंधे होते हैं। जब लोग ऐसे नेताओं का अनुसरण करते हैं, तो वे भविष्य में असीमित पीड़ा सहते हैं। तथाकथित प्रगति के बावजूद, यह सब हो रहा है। कौन सुरक्षित है? कौन सुखी है? कौन चिंतामुक्त है?

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)