श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 24: आत्माराम श्लोक की 61 व्याख्याएँ  »  श्लोक 231
 
 
श्लोक  2.24.231 
वन - पथे देखे मृग आछे भूमे पड़ि’ ।
बाण - विद्ध भग्न - पाद करे ध ड् - फड़ि ॥231॥
 
 
अनुवाद
नारद मुनि ने देखा कि जंगल के रास्ते में एक हिरण पड़ा है और उसे तीर लगा हुआ है। उसके पैर टूटे हुए थे और वह बहुत दर्द से तड़प रहा था।
 
"While traveling through the forest, the sage Narada saw a deer lying on the road, pierced by an arrow. Its legs were broken and it was writhing in intense pain."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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