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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 24: आत्माराम श्लोक की 61 व्याख्याएँ  »  श्लोक 215
 
 
श्लोक  2.24.215 
कर्मण्यस्मिन्ननाश्वासे धूम - धूम्रात्मनां भवान् ।
आपाययति गोविन्द - पाद - पद्मासवं मधु ॥215॥
 
 
अनुवाद
"हमने अभी-अभी यह सकाम कर्म, यज्ञ, आरम्भ किया है, किन्तु हमारे कर्म में अनेक अपूर्णताओं के कारण, हम इसके फल के बारे में निश्चित नहीं हैं। धुएँ से हमारे शरीर काले पड़ गए हैं, किन्तु हम वास्तव में भगवान गोविन्द के चरणकमलों के अमृत से प्रसन्न हैं, जिसे आप बाँट रहे हैं।"
 
"We have just begun this fruitive ritual—the Agnihotra—but because of many flaws in our work, we are uncertain about its results. Our bodies have become blackened by the smoke, but we are truly pleased with the nectar from the lotus feet of Lord Govinda that you are distributing."
तात्पर्य
श्रीमद् भागवतम में दिए इस श्लोक (1.18.12) को सूत गोस्वामी ने नैमिषारण्य में महान ऋषियों की सभा में बोला था। महान ऋषियों का नेतृत्व शौनक कर रहे थे और सूत गोस्वामी उस सभा में भगवान के अद्भुत कार्यों के बारे में बात कर रहे थे। उस समय, वहां एकत्र हुए सभी ऋषि अनुष्ठानों को पूरा करने में असमर्थ थे क्योंकि उनके परिणामों के बारे में कोई सकारात्मक आश्वासन नहीं था। आग से निकलने वाले भारी धुएँ के कारण सभी अनुष्ठान करने वाले काली राख से सराबोर हो गए थे।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)