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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 24: आत्माराम श्लोक की 61 व्याख्याएँ  »  श्लोक 210
 
 
श्लोक  2.24.210 
आगे ‘तेर’ अर्थ करि लुँ, आर ‘छय’ एइ ।
ऊनविंशति अर्थ हइल मिलि’ एइ दुइ ॥210॥
 
 
अनुवाद
"मैं पहले ही [आत्माराम श्लोक के] तेरह अर्थ बता चुका हूँ। अब छह और हैं। कुल मिलाकर उन्नीस होते हैं।"
 
I have already explained thirteen meanings (of the Atmaram verse). Now here are six more. Added together, they bring the total to nineteen.
तात्पर्य
पद के इस प्रकार के छ: अर्थों से पद की छ: और भी व्याख्‍याएँ बनती है। (1) मानसिक चिन्‍तक (देखें श्‍लोक 165), (2) विभिन्‍न प्रकार के कार्यों में लगे हुए (देखें श्‍लोक 168), (3) धीर और शांत (देखें श्‍लोक 174), (4) बुद्धिमान और विद्वान शिष्‍य (देखें श्‍लोक 187), (5) बुद्धिमान परंतु निरक्षर और मूर्ख (देखें श्‍लोक 187), और (6) जो अपनी कॄष्‍ण के प्रति अनन्‍त सेवक होने की सचेत है (देखें श्‍लोक 201)।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)