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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 24: आत्माराम श्लोक की 61 व्याख्याएँ  »  श्लोक 207
 
 
श्लोक  2.24.207 
गा गोपकैरनु - वनं नयतोरुदार - वेणु - स्वनैः कल - पदैस्तनु - भृत्सु सख्यः ।
अस्पन्दनं गतिमतां पुलकस्तरूणां निर्योग - पाश - कृत - लक्षणयोर्विचित्रम् ॥207॥
 
 
अनुवाद
“मेरे प्रिय मित्र, कृष्ण और बलराम अपने ग्वाल मित्रों के साथ अपनी गायों को ले जाते हुए वन से गुजर रहे हैं। वे दोनों रस्सियाँ लिए हुए हैं जिनसे वे दूध दुहते समय गायों के पिछले पैर बाँधते हैं। जब वे अपनी बाँसुरी बजाते हैं, तो सभी चराचर जीव स्तब्ध रह जाते हैं और जड़ जीव उनके मधुर संगीत से आनंदित हो उठते हैं। ये सभी वस्तुएँ निःसंदेह अत्यंत अद्भुत हैं।”
 
"O friend, Krishna and Balarama are both walking through the forest with their cowherd friends, leading their cows. They both have ropes with which they tie the cows' hind legs while milking them. When they play their flutes, all moving creatures are astonished, and the stationary creatures experience immense joy at their sweet music. All these things are indeed very astonishing."
तात्पर्य
यह श्रीमद्-भागवतम (10.21.19) का एक उद्धरण है। जैसे ही कृष्ण, बलदेव के साथ जंगल में भ्रमण कर रहे थे और वे दोनों अपनी बाँसुरी बजा रहे थे, सभी गोपियाँ उनकी ओर बहुत आकर्षित हो गईं। इस प्रकार उन्होंने भगवान की गतिविधियों की प्रशंसा की, यह बताते हुए कि कैसे वह सभी पौधों, पक्षियों, पहाड़ियों, पानी - हर चीज का उत्साह वर्धन कर रहे थे।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)