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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 24: आत्माराम श्लोक की 61 व्याख्याएँ  »  श्लोक 202
 
 
श्लोक  2.24.202 
च - शब्दे ‘एव’, ‘अपि’ - शब्द समुच्चये ।
‘आत्मारामा ए व’ हञा श्री - कृष्ण भजये ॥202॥
 
 
अनुवाद
"ऐसी स्थिति में, 'च' शब्द से तात्पर्य 'एव' शब्द से है। 'अपि' शब्द को एकत्रीकरण के अर्थ में लिया जा सकता है। इस प्रकार यह श्लोक इस प्रकार होगा: आत्माराम एव - अर्थात्, 'सभी प्रकार के जीव भी कृष्ण की पूजा करते हैं।'
 
"In that case, the word 'cha' means 'and'. The word 'api' can be taken to mean a combination. Thus, the verse would read 'atmarama e va,' meaning "all kinds of living beings also worship Krishna."
तात्पर्य
यह उल्लेखनीय है कि प्रत्येक जीव आत्मारामा है। माया के प्रभाव से अस्थायी रूप से ढंका हुआ जीव अपनी इन्द्रियों की सेवा करता है जिन्हें काम-क्रोध-लोभ-मोह-मद-मात्सर्य के रूप में प्रस्तुत किया गया है - वासना, क्रोध, लालच, भ्रम, पागलपन और ईर्ष्या। भौतिक स्थिति में सभी जीव इन्द्रियतृप्ति में लिप्त रहते हैं, लेकिन जब वे भगवान के नियमों का पालन करने वाले भक्तों से मिलते हैं, तो वे शुद्ध होते हैं और अपनी मूल चेतना से जागृत होते हैं। फिर वे भगवान कृष्ण की इन्द्रियों को संतुष्ट करने और उनकी भक्ति सेवा में संलग्न होने का प्रयास करते हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)