श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 24: आत्माराम श्लोक की 61 व्याख्याएँ  »  श्लोक 181
 
 
श्लोक  2.24.181 
धृतिः स्यात्पूर्णता - ज्ञान - दुःखाभावोत्तमाप्तिभिः ।
अप्राप्तातीत - नष्टार्था - नभिसंशोचनादि - कृत् ॥181॥
 
 
अनुवाद
"धृति वह पूर्णता है जो दुःख के अभाव और परम प्रभु के ज्ञान एवं उनके प्रति शुद्ध प्रेम की प्राप्ति के कारण अनुभव की जाती है। किसी लक्ष्य की प्राप्ति न होने या प्राप्त वस्तु के खो जाने से उत्पन्न शोक इस पूर्णता को प्रभावित नहीं करता।"
 
"Dhriti is the perfection experienced in the absence of suffering, in the attainment of knowledge of God and pure love for Him. This perfection is not affected by the suffering caused by the failure to attain a goal or the loss of something acquired."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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