Warning: Undefined array key 1 in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 93

Deprecated: nl2br(): Passing null to parameter #1 ($string) of type string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 97
श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 24: आत्माराम श्लोक की 61 व्याख्याएँ  »  श्लोक 177
 
 
श्लोक  2.24.177 
एतेऽलिनस्तव यशोऽखिल - लोक - तीर्थं गायन्त आदि - पुरुषानुपथं भजन्ते ।
प्रायो अमी मुनि - गणा भवदीय - मुख्या गूढ़म् वनेऽपि न जहत्यनघात्म - दैवम् ॥177॥
 
 
अनुवाद
"हे सौभाग्य स्वरूप! हे आदि पुरुषोत्तम भगवान, ये सभी मधुमक्खियाँ आपके दिव्य यश का कीर्तन कर रही हैं, जो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को पवित्र कर देगा। निःसंदेह, वे वन में आपके मार्ग का अनुसरण कर आपकी पूजा कर रही हैं। वास्तव में वे सभी साधु पुरुष हैं, किन्तु अब उन्होंने मधुमक्खियाँ का रूप धारण कर लिया है। यद्यपि आप मनुष्य की भाँति क्रीड़ा कर रहे हैं, फिर भी वे यह नहीं भूल पा रही हैं कि आप ही उनके आराध्य देव हैं।"
 
"O embodiment of good fortune! O Primordial Being, all these bumblebees are singing your divine glories, which will purify the entire universe. Indeed, they are following your path in the forest and worshipping you. In reality, they are all saintly men, but now they have assumed the form of bumblebees. Although you are playing like a human, they have not forgotten that you are their worshipable deity."
तात्पर्य
यह श्रीमद्-भागवतम् (10.15.6) से उद्धृत है। कृष्ण और बलराम अभी बाल्यावस्था की दहलीज़ पर ही थे और वृंदावन के जंगल में प्रवेश कर रहे थे जब कृष्ण ने बलराम को प्रसन्न करने के लिए प्रार्थना करना शुरू किया।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)