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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 24: आत्माराम श्लोक की 61 व्याख्याएँ  »  श्लोक 172
 
 
श्लोक  2.24.172 
साधनौधैरनासङ्गैरलभ्या सु - चिरादपि ।
हरिणा चाश्वदेयेति द्विधा सा स्यात्सु - दुर्लभा ॥172॥
 
 
अनुवाद
"भक्ति में पूर्णता प्राप्त करना दो कारणों से अत्यंत कठिन है। पहला, जब तक कोई कृष्ण के प्रति आसक्त न हो, वह दीर्घकाल तक भक्ति सेवा करने पर भी भक्ति में पूर्णता प्राप्त नहीं कर सकता। दूसरा, कृष्ण भक्ति में पूर्णता आसानी से प्रदान नहीं करते।"
 
"Achieving perfection in devotion is extremely difficult for two reasons. First, unless one is deeply attached to Krishna, one cannot attain perfection in devotion, even if one continues to practice devotion for a long time. Second, Krishna does not easily grant perfection in devotion."
तात्पर्य
जैसा कि श्रीमद् भागवतम (5.6.18) में उल्लिखित है, मुक्तिं ददति कार्हिचित्। श्रील सुकदेव गोस्वामी ने महाराज परीक्षित से कहा कि कृष्ण आसानी से मुक्ति प्रदान करते हैं लेकिन भक्ति सेवा में पूर्णता बहुत आसानी से प्रदान नहीं करते हैं। इसका मतलब है कि कृष्ण यह देखना चाहते हैं कि भक्त वास्तव में ईमानदार और गंभीर है और उसके कोई छिपे मकसद नहीं हैं। यदि ऐसा है, तो भक्ति सेवा बहुत आसानी से सफल हो सकती है; अन्यथा सर्वोच्च व्यक्तित्व के भगवान से प्राप्त करना बहुत कठिन है। यह श्लोक भक्ति-रसामृत-सिंधु (1.1.35) में प्रकट होता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)