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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 24: आत्माराम श्लोक की 61 व्याख्याएँ  »  श्लोक 145
 
 
श्लोक  2.24.145 
एइ छय आत्माराम कृष्णेरे भजय ।
पृथक् - पृथक् च - कारे इहा ‘अपि’र अर्थ कय ॥145॥
 
 
अनुवाद
"ये छह प्रकार के आत्माराम कृष्ण की प्रेममयी सेवा में लगे रहते हैं। सेवा के प्रकारों को 'च' जोड़कर दर्शाया गया है, और वे 'अपि' ['वास्तव में'] का अर्थ भी रखते हैं।
 
"These six types of Atmarama are engaged in the loving service of Krishna. The different types of service are indicated by the prefix 'cha' and they also carry the meaning of 'api' (undoubtedly)."
तात्पर्य
आत्मारामा के छह भेद हैं: नवोदित छात्र (साधक), ब्रह्म साक्षात्कार में लीन (ब्रह्म-मय), जो पहले ही ब्रह्म पद को प्राप्त कर चुका है (प्राप्त-ब्रह्म-लय), जो मुक्त होना चाहता है (मुमुक्षु), जो इस जीवन में भी मुक्त है (जीवन्-मुक्त), और जो आत्म-साक्षात्कारी है (प्राप्त-स्वरूप)।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)