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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 24: आत्माराम श्लोक की 61 व्याख्याएँ  »  श्लोक 124
 
 
श्लोक  2.24.124 
सेइ सबेर साधु - सङ्गे गुण स्फुराय ।
कृष्ण - भजन कराय, ‘मुमुक्षा’ छाड़ाय ॥124॥
 
 
अनुवाद
"यदि जो लोग देवताओं की पूजा में आसक्त हैं, वे सौभाग्यवश भक्तों की संगति करते हैं, तो उनकी सुप्त भक्ति और भगवान के गुणों के प्रति प्रशंसा धीरे-धीरे जागृत हो जाती है। इस प्रकार वे भी कृष्ण की भक्ति में लग जाते हैं और मोक्ष की कामना तथा निराकार ब्रह्म में विलीन होने की इच्छा त्याग देते हैं।
 
"If those enamored with the worship of gods are fortunate enough to find the company of devotees, their dormant devotion and love for the qualities of the Lord gradually awaken. Thus, they too begin to worship Krishna and abandon their desire for liberation and merging with the impersonal Brahman."
तात्पर्य
चार कुमारों (चतुःसन), शुकादेव गोस्वामी और नौ योगेंद्रों ने ब्रह्म-साक्षात्कार में ध्यान लगाया था और कैसे वे भक्त बने, इसका यहाँ वर्णन किया गया है। तीन प्रकार के निर्वैयक्तिक हैं - मुमुक्षु (जो मुक्ति चाहते हैं), जीवन्मुक्त (जो इस जीवन में मुक्त हैं) और प्राप्त-स्वरूप (जो ब्रह्म-साक्षात्कार में विलीन हैं)। सभी तीन प्रकार के ज्ञानियों को मोक्षकांक्षी कहा जाता है, जो मुक्ति चाहते हैं। भक्तों के साथ संगति करने से, ऐसे लोग मुमुक्षु सिद्धांत को त्याग देते हैं और भक्ति सेवा करते हैं। इस परिवर्तन का वास्तविक कारण भक्तों की संगति है। कृष्णभावनामृत आंदोलन सभी प्रकार के लोगों को आकर्षित करने के लिए है, यहाँ तक कि उन लोगों को भी जो भगवान की भक्ति सेवा के अलावा अन्य चीजें चाहते हैं। भक्तों की संगत के माध्यम से, वे धीरे-धीरे भक्ति सेवा करना शुरू कर देते हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)