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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 24: आत्माराम श्लोक की 61 व्याख्याएँ  »  श्लोक 112
 
 
श्लोक  2.24.112 
“मुक्ता अपि लीलया विग्रहं
कृत्वा भगवन्तं भजन्ते” ॥112॥
 
 
अनुवाद
"निर्विशेष ब्रह्म तेज में लीन मुक्त आत्मा भी कृष्ण की लीलाओं की ओर आकर्षित होती है। इस प्रकार वह एक अर्चाविग्रह स्थापित करता है और भगवान की सेवा करता है।"
 
"Even a liberated soul, absorbed in the impersonal Brahman, is drawn to the pastimes of Krishna. Then, after establishing an idol, he serves the Lord."
तात्पर्य
अत्यधिक उच्च स्थान प्राप्त मायवाद सन्न्यासी कभी-कभी राधा-कृष्ण देवता की पूजा करते हैं और प्रभु के पवित्र कृत्यों की चर्चा करते हैं, पर उनका उद्देश्य गोलोक वृन्दावन तक ऊपर उठना नहीं है। वे प्रभु के तेज में विलीन होना चाहते हैं। यह कथन नृसिम्ह-तापनी नामक उपनिषद पर शंकराचार्य की टीका से उद्धृत किया गया है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)