ब्रह्म-भूत: प्रसन्नात्मा न शोचति न कांक्षति
सम: सर्वेषु भूतेषु मद्-भक्तिं लभते परम्
"जो इस प्रकार पारलौकिक रूप से स्थित है, वह तुरंत परम ब्रह्म का साक्षात्कार करता है और पूर्ण रूप से हर्षित हो जाता है। वह कभी शोक नहीं करता या कुछ पाने की इच्छा नहीं करता है; वह हर जीवित प्राणी के प्रति समान रूप से निपटाया जाता है। उस अवस्था में वह मेरे प्रति शुद्ध भक्ति सेवा प्राप्त करता है।"
शुद्ध भक्ति सेवा के मंच को प्राप्त करने के लिए, व्यक्ति को आध्यात्मिक रूप से शुद्ध होना पड़ता है और ब्रह्म-भूत मंच को प्राप्त करना पड़ता है, जो भौतिक चिंता और भौतिक भेदभाव से परे है। जब कोई ब्रह्म को साकार करने के बाद शुद्ध भक्ति सेवा की ओर अग्रसर होता है, तो वह शुद्ध भक्ति सेवा की ओर आकर्षित हो जाता है। ऐसे समय में, भक्ति सेवा प्रदान करने से, व्यक्ति को शुद्ध इंद्रियों के साथ एक आध्यात्मिक शरीर प्राप्त होता है।
सर्वोपाधि-विनिर्मुक्तं तत्-परत्वेन निर्मलम्
हृषीकेण हृषीकेश- सेवनं भक्तिरुच्यते
जब किसी की इंद्रियाँ शुद्ध होती हैं, तो वह कृष्ण को प्रेममय भक्ति सेवा प्रदान कर सकता है। एक शुद्ध भक्त केवल कृष्ण के पारलौकिक गुणों को याद रख सकता है। उन्हें याद करते हुए, वह प्रभु की प्रेममय सेवा में पूरी तरह से संलग्न है।
