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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 24: आत्माराम श्लोक की 61 व्याख्याएँ  »  श्लोक 111
 
 
श्लोक  2.24.111 
भक्त - देह पाइले हय गुणेर स्मरण ।
गुणाकृष्ट हञा करे निर्मल भजन ॥111॥
 
 
अनुवाद
"जब किसी को भक्त का आध्यात्मिक शरीर प्राप्त होता है, तो वह कृष्ण के दिव्य गुणों का स्मरण कर सकता है। कृष्ण के दिव्य गुणों की ओर आकर्षित होने मात्र से ही, व्यक्ति उनकी सेवा में लीन एक शुद्ध भक्त बन जाता है।
 
"Once a devotee has attained the spiritual body, one can remember Krishna's transcendental qualities. Simply by being attracted to Krishna's transcendental qualities, one becomes a pure devotee, engaged in His service."
तात्पर्य
श्रील भक्तिविनोद ठाकुर जी ने श्लोक 107-111 का निम्न सारांश दिया है। तार्किक चिंतन के मार्ग पर चलने वाले तत्वज्ञ दो श्रेणियों में विभाजित किए जा सकते हैं - निराकार ब्रह्म के शुद्ध उपासक और वे जो निराकार ब्रह्म के अस्तित्व में विलीन होना चाहते हैं। जब कोई इस विचार में पूर्ण रूप से तल्लीन हो जाता है कि वह परम निरपेक्ष सत्य से भिन्न नहीं है, तो उसे निराकार ब्रह्म का उपासक कहा जाता है। ब्रह्म के निराकार उपासकों को फिर से तीन श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है - (1) साधक, जो ब्रह्म साक्षात्कार की प्रक्रिया को पूर्ण निष्पादन के करीब ला रहे हैं; (2) वे जो ब्रह्म पर ध्यान में पूरी तरह से लीन हैं; और (3) वे जो ब्रह्म-भूत मंच पर हैं और भौतिक अस्तित्व से उनका कोई संबंध नहीं है। यद्यपि निराकार ब्रह्म के उपासक अत्यधिक उन्नत हो सकते हैं, वे भक्ति सेवा के निर्वहन के बिना मुक्ति प्राप्त नहीं कर सकते। जिसने भी आत्मा को आत्मा के रूप में साकार कर लिया है, वह भक्ति सेवा में संलग्न हो सकता है। यही भागवद-गीता (18.54) का निर्णय है:

ब्रह्म-भूत: प्रसन्नात्मा न शोचति न कांक्षति

सम: सर्वेषु भूतेषु मद्-भक्तिं लभते परम्

"जो इस प्रकार पारलौकिक रूप से स्थित है, वह तुरंत परम ब्रह्म का साक्षात्कार करता है और पूर्ण रूप से हर्षित हो जाता है। वह कभी शोक नहीं करता या कुछ पाने की इच्छा नहीं करता है; वह हर जीवित प्राणी के प्रति समान रूप से निपटाया जाता है। उस अवस्था में वह मेरे प्रति शुद्ध भक्ति सेवा प्राप्त करता है।"

शुद्ध भक्ति सेवा के मंच को प्राप्त करने के लिए, व्यक्ति को आध्यात्मिक रूप से शुद्ध होना पड़ता है और ब्रह्म-भूत मंच को प्राप्त करना पड़ता है, जो भौतिक चिंता और भौतिक भेदभाव से परे है। जब कोई ब्रह्म को साकार करने के बाद शुद्ध भक्ति सेवा की ओर अग्रसर होता है, तो वह शुद्ध भक्ति सेवा की ओर आकर्षित हो जाता है। ऐसे समय में, भक्ति सेवा प्रदान करने से, व्यक्ति को शुद्ध इंद्रियों के साथ एक आध्यात्मिक शरीर प्राप्त होता है।

सर्वोपाधि-विनिर्मुक्तं तत्-परत्वेन निर्मलम्

हृषीकेण हृषीकेश- सेवनं भक्तिरुच्यते

जब किसी की इंद्रियाँ शुद्ध होती हैं, तो वह कृष्ण को प्रेममय भक्ति सेवा प्रदान कर सकता है। एक शुद्ध भक्त केवल कृष्ण के पारलौकिक गुणों को याद रख सकता है। उन्हें याद करते हुए, वह प्रभु की प्रेममय सेवा में पूरी तरह से संलग्न है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)