श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 23: जीवन का चरम लक्ष्य -भगवत्प्रेम  »  श्लोक 95-98
 
 
श्लोक  2.23.95-98 
भक्ति - निर्भूत - दोषाणां प्रसन्नोज्वल - चेतसाम् ।
श्री - भागवत - रक्तानां रसिकासङ्ग - रङ्गिणाम् ॥95॥
जीवनी - भूत - गोविन्द - पाद - भक्ति - सुख - श्रियाम् ।
प्रेमान्तरङ्ग - भूतानि कृत्यान्येवानुतिष्ठताम् ॥96॥
भक्तानां हृदि राजन्ती संस्कार - युगलोज्वला ।
रतिरानन्द - रूपैव नीयमाना तु रस्यताम् ॥97॥
कृष्णादिभिर्विभावाद्यैर्गतैरनुभवाध्वनि ।
प्रौढ़ानन्दश्चमत्कार - काष्ठामापद्यते पराम् ॥98॥
 
 
अनुवाद
“जो लोग शुद्ध भक्ति द्वारा समस्त भौतिक कल्मष से पूर्णतः धुल गए हैं, जो हृदय में सदैव संतुष्ट और प्रकाशमान रहते हैं, जो श्रीमद्भागवत के दिव्य अर्थ को समझने में सदैव संलग्न रहते हैं, जो सदैव उन्नत भक्तों की संगति के लिए तत्पर रहते हैं, जिनका जीवन ही गोविंद के चरणकमलों की सेवा में आनंदित होना है, जो सदैव प्रेम के गोपनीय कार्यों का निर्वहन करते हैं - ऐसे उन्नत भक्तों के लिए, जो स्वभावतः आनंद में स्थित हैं, प्रेम का बीज [रति] पूर्व और वर्तमान सुधारात्मक प्रक्रियाओं द्वारा हृदय में विस्तृत होता है। इस प्रकार आनंदमय अवयवों का मिश्रण सुस्वादु हो जाता है और भक्त की अनुभूति में रहकर, आश्चर्य और गहन आनंद के उच्चतम स्तर तक पहुँच जाता है।’
 
"Those who have been completely liberated from all material contamination through devotion, who are always content and whose hearts are fully illuminated by knowledge, who are always attached to understanding the transcendental meaning of the Srimad Bhagavatam, who are always eager to associate with advanced devotees, whose life consists solely in the joy derived from serving the feet of Govinda, who always perform the secret acts of love—for such advanced devotees, who are naturally situated in bliss, the seed of love (rati) expands in the heart from past and present impressions. Thus the mixture of the elements of emotion becomes delicious and, being experienced by the devotee, reaches the highest stage of miracle and deep bliss."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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