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अनुवाद
“ इन साठ दिव्य गुणों के अतिरिक्त, कृष्ण में चार अतिरिक्त दिव्य गुण हैं, जो नारायण के व्यक्तित्व में भी प्रकट नहीं होते। ये हैं: (1) कृष्ण लीलाओं की लहरों से भरे एक सागर के समान हैं जो तीनों लोकों में सभी के भीतर आश्चर्य उत्पन्न करते हैं। (2) अपने दाम्पत्य प्रेम के कार्यों में, वे सदैव अपने प्रिय भक्तों से घिरे रहते हैं, जिनका उनसे अप्रतिम प्रेम है। (3) वे अपनी बांसुरी की मधुर ध्वनि से तीनों लोकों के मनों को आकर्षित करते हैं। (4) उनका व्यक्तिगत सौंदर्य और ऐश्वर्य अतुलनीय है। कोई भी उनके बराबर नहीं है, और कोई भी उनसे बड़ा नहीं है। इस प्रकार भगवान का व्यक्तित्व तीनों लोकों में सभी जीवित संस्थाओं, जंगम और अजीव, को आश्चर्यचकित करता है। वे इतने सुंदर हैं कि उन्हें कृष्ण कहा जाता है।
"In addition to these sixty transcendental qualities, Krishna possesses four other transcendental qualities that are not even found in Narayana. These are: (1) Krishna is like an ocean filled with waves of pastimes that awe every being in the three worlds. (2) He is always surrounded by His beloved devotees, who have unparalleled love for Him, in His activities of sweetness and love. (3) He captivates the minds of all the three worlds with the sweet sound of His flute. (4) His beauty and majesty are unparalleled. No one is equal to Him or surpasses Him. In this way, the Lord amazes all living and non-living beings in the three worlds. He is so beautiful that He is called Krishna."
तात्पर्य
मायावादी दार्शनिक, जिनके पास ज्ञान की एक अल्प निधि है, केवल इस विषय को बताकर खारिज कर देते हैं कि कृष्ण का अर्थ है "काला।" कृष्ण के गुणों को समझ न पाने के कारण, ये नास्तिक गुंडे उन्हें भगवान के रूप में स्वीकार नहीं करते हैं। हालाँकि प्रभु को महान व्यक्तित्वों, आचार्यों और ऋषियों द्वारा वर्णित और स्वीकार किया गया है, फिर भी मायावादी उनकी सराहना नहीं करते हैं। दुर्भाग्य से, वर्तमान समय में मानव समाज इतना नीच हो गया है कि लोग स्वयं के जीवन की दैनिक जरूरतों को भी पूरा नहीं कर पा रहे हैं, फिर भी वे मायावादी दार्शनिकों से मोहित हैं और उन्हें गुमराह किया जा रहा है। भगवद्-गीता के अनुसार, केवल कृष्ण को समझने से ही व्यक्ति जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्त हो सकता है। त्यक्त्वा देहं पुनर् जन्म नैति मां एति सोऽर्जुन। दुर्भाग्य से कृष्ण चेतना के इस महान विज्ञान को मायावादी दार्शनिकों द्वारा बाधित किया गया है, जो कृष्ण के व्यक्तित्व का विरोध करते हैं। जो लोग इस कृष्ण चेतना आंदोलन का प्रचार कर रहे हैं, उन्हें भक्ति-रसामृत-सिंधु (भक्ति का अमृत) में दिए गए बयानों से कृष्ण को समझने का प्रयास करना चाहिए।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥