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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 23: जीवन का चरम लक्ष्य -भगवत्प्रेम  »  श्लोक 77
 
 
श्लोक  2.23.77 
जीवेष्वेते वसन्तोऽपि बिन्दु - बिन्दुतया क्वचित् ।
परिपूर्णतया भान्ति तत्रैव पुरुषोत्तमे ॥77॥
 
 
अनुवाद
“ये गुण कभी-कभी जीवों में बहुत सूक्ष्म रूप से प्रदर्शित होते हैं, लेकिन वे भगवान के परम व्यक्तित्व में पूरी तरह से प्रकट होते हैं।”
 
“These qualities sometimes appear in subtle quantities in living beings, but they appear completely in the Supreme Personality of Godhead.”
तात्पर्य
यह श्लोक भक्तिरसामृतसिन्धु (2.1.30) में पाया जाता है। जीव ईश्वर के अंश हैं। जैसा कि भगवान कृष्ण ने भगवद्गीता (15.7) में बताया है:

माम एवांशो जीव-लो के जीव, भूत: सनातन:

मन: षष्ठानींद्रियाणि, प्रकृति स्थाणि करषति

“इस भौतिक जगत में जीव मेरे शाश्वत अंश हैं। भौतिक जीवन के कारण, मन सहित छह इंद्रियों के साथ वे बहुत अधिक संघर्ष कर रहे हैं।”

कृष्ण के गुण जीव में सूक्ष्म, परमाणु मात्रा में मौजूद हैं। सोने का एक छोटा सा भाग निश्चित रूप से सोना है, लेकिन यह एक सोने की खान के बराबर नहीं हो सकता। इसी तरह, जीवों में ईश्वर के सभी गुण सूक्ष्म मात्रा में होते हैं, लेकिन जीव कभी भी ईश्वर के समान नहीं होता है। इसलिए ईश्वर को परमेश्वर के रूप में वर्णित किया जाता है, और जीव को जीवा के रूप में वर्णित किया जाता है। ईश्वर को सभी जीवों के प्रधान, परमेश्वर के रूप में वर्णित किया गया है, क्योंकि वह दूसरों की सभी आवश्यकताओं की आपूर्ति करता है - एको बहुनाम यो विदधाति कामान। मायावादी मानते हैं कि हर कोई ईश्वर है, लेकिन भले ही इस दर्शन को स्वीकार कर लिया जाए, फिर भी कोई यह नहीं कह सकता कि हर कोई हर तरह से सर्वोच्च ईश्वर के बराबर है। केवल मूर्ख व्यक्ति ही यह मानते हैं कि हर कोई ईश्वर के बराबर है या हर कोई ईश्वर है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)