श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 23: जीवन का चरम लक्ष्य -भगवत्प्रेम  »  श्लोक 69
 
 
श्लोक  2.23.69 
अनन्त कृष्णेर गुण, चौषट्टि - प्रधान ।
एक एक गुण शुनि’ जुड़ाय भक्त - काण ॥69॥
 
 
अनुवाद
"भगवान कृष्ण के दिव्य गुण अनंत हैं। इनमें से चौंसठ प्रमुख माने जाते हैं। भक्तों के कान इन सभी गुणों को एक-एक करके सुनने मात्र से तृप्त हो जाते हैं।"
 
"Lord Krishna's divine qualities are endless, of which sixty-four are considered the most important. Simply listening to these qualities in sequence satisfies the ears of devotees."
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd